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जानवर ( नज़्म )

'जानवर' ( नज़्म ) बहुत अजीब दुनिया है हमारी भी यहाँ पे कुत्ते-बिल्लियों का है सलौन यहाँ पे ए.सी. गाड़ियों में घूमते हैं जानवर झुलस-ठिठुर के फ़र्द मर गए पर इंसाँ के यहाँ यहाँ पे थालियों में जूठा छोड़ते हैं जानवर बिलक रहे हैं बच्चे भूक से पर इंसाँ के यहाँ हर एक जानवर को है पता इलाज भूक का वो जानवर हैं और हम इक इंसाँ हैं हमें ये क्यूँ समझ नहीं, हमें ये दिखता क्यूँ नहीं हमारे भूक का इलाज जानवर से है अलग वो जानवर हैं कच्चा-पक्का कुछ भी खा के जीएँ'गे हमें मगर ये सोचना है इंसाँ कैसे जीएँ'गे भला करो,मगर ये याद रक्खो हम हैं इंसाँ ज़ात हमारा फ़र्ज़ बनता है हमारी ज़ात के लिए मगर हमें है फ़िक्र ज़ात और की वो ज़ात जिनको हमसे है लगाव रोटी के लिए वो ज़ात जिसको फ़र्क़ ही नहीं कि शख़्स कौन है खिलाये जो वो प्यार है,बजाए अक्स कौन है किसी भी जानवर को प्यार इतना ही करो 'नज़र' कि बच्चा कोई इंसाँ का ये आरज़ू करे नहीं मैं जानवर ही होता काश!  मैं जानवर ही होता काश!! — नज़र ' جانور ' ( نظم ) بہت عجیب دنیا ہے ہماری بھی یہاں پہ کُتّے بلیوں کا ہے سلوں یہاں پے اے۔ سی ۔ گاڑیوں میں گھومتے ہیں جانور جھ...