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सफ़र ए मोहब्बत

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मोहब्बत गुज़रती है तोहमत से होके , गुज़रती है फिर वो ही रहमत से होके , इनायत से होके ,अक़ीदत से होके , झिझक से भी होके ,हया से भी होके , मोहब्बत मगर है हया से भी आगे , शरारत से होके ,शिकायत के आगे , है जन्नत से होके , वो जिल्लत के आगे , मगर है उतरना यहाँ नागवारा , जो उतरे कोई तो दग़ाबाज़ है वो , मगर ये है आलम ,यहाँ लोग अक्सर , बता के मोहब्बत ,उतरते हैं जन्नत , मगर कुछ दिवानों ने देखी है जिल्लत , बढ़े भी हैं आगे वो वहशत से होके , इबादत से आगे सदाक़त से होके , नदामत से आगे , हाँ , नफ़रत से होके , मलामत से आगे , अज़ीयत से होके , ये पाने ओ खोने की हसरत के आगे , जो बुझने न पाये ,शमा वो जला के , बढ़ोगे अगर तुम मसाफ़त में आगे , गरज़ सब भुला के जो चाहत के आगे , क़ज़ा की रियासत से कुछ मील पहले , दिखेगी तुम्हे फिर जो तख़्ती सुकूूँ की , तुम उतरो न उतरो ,वही है मोहब्बत , मोहब्बत की गाड़ी वहीं पे रुकेगी । — नज़र तोहमत - False Allegation , झूठा आरोप इनायत - Kindness अक़ीदत - Faith , Affection , Attachment हया - shame , शर्म नागवारा - Not acceptable ...

इज़हार (नज़्म)

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चढ़ा है ये मुझपर किसी आश्ना का ख़ुमार ये कैसा , मैं कहना भी चाहूँ पर कह भी ना पाऊँ मगर कह रहा हूँ , तू ही ज़ुस्तज़ू है ,तू ही आरज़ू है , सुकूँ में भी तू ही, जुनूँ में भी तू ही , अक़ीदत तू ही है ,इबादत तू ही है , दिल मे तुम ही हो ,ज़बाँ पे तुम ही हो , राहत भी तुम ही , चाहत भी तुम ही , यादों में तुम ही , बातों में तुम ही , सांसों में तुम ही , ख़्वाबों में तुम ही , दुआ भी तुम ही हो , दवा भी तुम ही हो , हसी भी तुम ही हो , खुशी भी तुम ही हो , छिपाता भी हूँ मैं ,जताता भी हूँ मैं , मगर दिल मे है जो ,बताता नही मैं , मगर आज खुल के दिल ओ जाँ से अपने लो कहता हूँ यारा , तुम हूर ए 'नज़र' हो ऐ जान ए तमन्ना मुझे दिल ओ जाँ से ... मोहब्बत है तुमसे ,मोहब्बत है तुमसे , मोहब्बत है तुमसे । — नज़र आश्ना - One who is devoted to love (Female) अक़ीदत - Faith हूर ए 'नज़र' - Nazar's Angel *Completely Fictious

नया साल

फ़ज़ाओं ने अपनी मिज़ाजें बदल लीं ? सलीक़ा हवाओं ने बहने का बदला ? रवैया अंधेरों ने आने का बदला ? या तब्दीलियाँ आ गईं हैं सहर में ? क़मर ने ज़मी को इशारे दिए कुछ ? सितारे ज़ियादा चमकने लगें क्या ? धनक ने निकलकर बताया नया कुछ ? या सूरज के रंगत में आया फ़रक कुछ ? न बदली फ़ज़ा ये न बदला ये मौसम , हाँ ,बदला है कुछ तो ये धरती का आलम , बदलने की फिर ख़ुद को ठाना है सबने, नए साल के फिर नए इस भरम में , हाँ ,तारीख़ों ने पैरहन अपने बदलें , अँधेरे नशे में भी हैं कुछ ज़ियादा , ज़रा सी हवाएँ भी ज़ख़्मी हुई है , तो कसमे ओ वादे भी मसरूफ़ होंगे , मगर ये जो हैं सब महज़ हैं सियापे , हम इंसान तारीख़ों के कब थें मोहताज़, बदलना है गर तो अभी ख़ुद को बदलो , मगर ये 'अभी' ज़ेहन में है हमारे । ― नज़र सहर - Morning क़मर - Moon धनक - Rainbow पैरहन - Dress मसरूफ़ - Busy #NewYear2019