मैं जानता हूँ ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहना इक ज़रूरी अम्ल है मैं जानता नहीं फ़क़त, मैं मानता भी हूँ कि ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहना चाहिए मगर मैं फिर से कहता हूँ , ये आगे बढ़ते रहना है ज़रूरी ज़हन-ओ-सोच का ज़मीर का ,नज़रिए का नज़रिया एक ये भी है कि क़ैद कर परिन्दे को वो सब दो जिसके वास्ते वो जी रहा मगर फिर ऐसा क्यूँ है वो, तुम्हारे पिंजरा खोलते ही तुमको छोड़ जाता है नज़रिया एक ये भी है कि रोज़ इक परिन्दे को दिया करो ख़ुराक-ओ-प्यार अजब नहीं वो तुमसे दूर जाने के बजाए पास आएगा यही तो है ना सोच का,विचार का,नज़रिए और ज़हन का सहीह मायने में आगे बढ़ना फिर नज़रिया एक ये भी है कि धर्म इक तुम्हारा ही सहीह और सच है बस कोई भी ग़ैर धर्म है मज़ाक-ओ-झूठ सा तुम्हारे वास्ते नज़रिया एक ये भी है कि जाति-धर्म कुछ नहीं हर एक फ़र्द की वही बनावट और चाल है बनाने वाले ने तो एक फ़र्क़ तक किया नहीं तो तुमने जाति-धर्म का मुखौटा क्यूँ लगा लिया अना ये कैसी है,तुम्हारी धारणा ही सच है बस अना ये कैसी है कि हम अलग-अलग पर एक हैं नज़रिया एक ये भी है पुरानी मान्यताओं...