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थी पहले (ग़ज़ल)

वो दुख में रो लिया करती थी पहले बहुत ही ख़ुशनुमा लड़की थी पहले ​وہ دکھ میں رو لیا کرتی تھی پہلے بہت ہی خوشنما لڑکی تھی پہلے ​मुझे जो ज़िंदगी नेमत सी है आज अजब है बद्दुआ लगती थी पहले مجھے جو زندگی نعمت سی ہے آج عجب ہے بددعا لگتی تھی پہلے ​तुले हो आस्तिक करने में जिसको वो हर पत्थर को रब कहती थी पहले ​تلے ہو آستک کرنے میں جس کو وہ ہر پتھر کو رب کہتی تھی پہلے ​मुहब्बत रूप की मोहताज है या वो मुझसे जाने क्या करती थी पहले ​محبت روپ کی محتاج ہے یا وہ مجھ سے جانے کیا کرتی تھی پہلے ​वो ख़ुद को बे-वफ़ा कर मर गई थी वो मुझसे इश्क़ में छोटी थी पहले ​وہ خود کو بے وفا کر مر گئی تھی وہ مجھ سے عشق میں چھوٹی تھی پہلے ​वो चुप थी यानी मैं उसमें नहीं अब वो वरना ऐसे में लड़ती थी पहले ​وہ چپ تھی یعنی میں اس میں نہیں اب وہ ورنہ ایسے میں لڑتی تھی پہلے '​नज़र' क्या दौर-ए-गिर्या होगी वो भी वो मेरी आँखों में रहती थी पहले 'نظر' کیا دورِ گریا ہوگی وہ بھی وہ میری آنکھوں میں رہتی تھی پہلے ​— नज़र نظر

नहीं (ग़ज़ल)

तू उसे इसलिए बस भूला नहीं दूसरा कोई मयस्सर था नहीं تو اُسے اسلئے بس بھولا نھیں دوسرا کوئی میسّر تھا نہیں जाने क्या नाम था उस शहर का दोस्त सिवा इक शक्ल के कुछ देखा नहीं جانے کیا نام تھا اُس شہر کا دوست سوا اک شکل کے کچھ دیکھا نہیں कुछ अजब लोग बता के सभी को कहते हैं फिर किसी से कहना नहीं کچھ عجب لوگ بتا کے سبھی کو کہتے ہیں پھر کسی سے کہنا نہیں उसमें ज़िन्दा है मुसलसल तो क्या वास्ते तेरे वो गर ज़िन्दा नहीं اُسمیں زندہ ہے مسلسل تو کیا واسطے تیرے وہ گر زندہ نہیں चर्चा-ए-शहर था बेटे का अमल रस्म-ए-गिर्या में भी वो रोया नहीं چرچاِ شہر تھا بیٹے کا عمل رسمِ گِرْیہ میں بھی وہ رویا نہیں उससे बढ़कर नहीं नफ़रत किसी से उससे बढ़कर कभी कोई था नहीं اُسّے بڑھکر نہیں نفرت کسی سے اُسّے بڑھکر کبھی کوئی تھا نہیں चाँद हासिल किया है जुगनू फिर कौन कहता है मेरे बस का नहीं چاند حاصل کیا ہے جُگنو پھر کوں کہتا ہے مِرے بس کا نہیں मौत बस एक बहाना है 'नज़र' लोग मिट जाते हैं या तो या नहीं موت بس ایک بہانہ ہے 'نظر' لوگ مٹ جاتے ہیں یا تو یا نہیں — नज़र نظر मयस्सर - Available मुसलसल - Continuously अमल - Act गिर्...

नहीं आती ( ग़ज़ल )

तुम्हें जिस तौर लगता है मुझे वैसी नहीं आती ग़ज़ल लिखनी तो आती है मगर कहनी नहीं आती تمہیں جس طور لگتا ہے مجھے ویسی نہیں آتی غزل لکھنی تو آتی ہے مگر کھنی نہیں آتی ज़ियादा ऊँचे सपने हों तो फिर परवाज़ भी रख तेज़ सफ़र में चलते रहने से कभी रोटी नहीं आती زیادہ اونچے سپنے ہوں تو پھر پرواز بھی رکھ تیز سفر میں چلتے رہنے سے کبھی روٹی نہیں آتی तुम्हारे बिन मैं अपनी ज़िन्दगी की क्या कहूँ तुमसे तुम्हारे बिन मेरी तस्वीर तक अच्छी नहीं आती تمہارے بن میں اپنی زندگی کی کیا کہوں تمسے تمہارے بن میری تصویر تک اچّھی نہیں آتی यक़ीनन नेकी और ईमाँ को रौंदा होगा फिर तुमने शरीफ़ इंसाँ तक अब इस मुल्क़ में कुर्सी नहीं आती یقیناً نیکی اور اماں کو روندا ہوگا پھر تمنے شریف انساں تک اب اس ملف میں کرسی نہیں آتی तुम्हारे शय के नख़रे उफ़ जो तुम रूठो तो ख़ाबों में कभी झुमके नहीं आते कभी बिन्दी नहीं आती تمہارے شے کے نخرے اف ، جو تم روٹھو تو خابوں میں کبھی جھمکے نہیں آتے کبھی بندی نہیں آتی अजब दुख है मेरा पहली नज़र का इश्क़ है यार और मुझे इंग्लिश नहीं आती उसे हिन्दी नहीं आती عجب دکھ ہے میرا پہلی نظر کا عشق ہے یار اور  مجھے انگلش نہیں آ...

होती नहीं ( ग़ज़ल )

कुछ शौक़ ऐसे होते हैं जिनसे गुज़र होती नहीं फिर जिनसे होती है गुज़र कार-ए-अमर होती नहीं کچھ شوق ایسے ہوتے ہیں جنسے گزر ہوتی نہیں پھر جنسے ہوتی ہے گزر کارِ عمر ہوتی نہیں कुछ चीज़ें होती हैं कि जिनका होता है तय वक़्त एक इक शब जवानी होती है जिसकी सहर होती नहीं کچھ چیزیں ہوتی ہیں کہ جنکا ہوتا ہے تے وقت ایک اِک شب جوانی ہوتی ہے جسکی سحر ہوتی نہیں इक उम्र आती है कि जब पहना नहीं करते हैं सुर्ख़ दिल कितना भी फिर क्यूँ न हो हिम्मत मगर होती नहीं اِک عُمر آتی ہے کہ جب پہنا نہیں کرتے ہیں سرخ دل کتنا بھی پر کیوں نہ ہو ہمّت مگر ہوتی نہیں इक हम-सफ़र गो ज़िन्दगी हो जाती है अक्सर मगर जो ज़िन्दगी हो जाए अक्सर हम-सफ़र होती नहीं اِک ہمسفر گو زندگی ہو جاتی ہے اکثر مگر جو زندگی ہو جائے اکثر ہمسفر ہوتی نہیں इक बे-वफ़ा की यादें काफ़ी कुछ सिखा के जाती हैं रहबर तो हो जाती है लेकिन चारा-गर होती नहीं اِک نے-وفا کی یادیں کافی کچھ سکھا کے جاتی ہے رہبر تو ہو جاتی ہے لیکن چراگر ہوتی نہیں कट जाती है कुछ सोहबतों में इन्तेहाई जल्दी शब ख़ास एक कोई शब कभी भी मुख़्तसर होती नहीं کٹ جاتی ہے کچھ صحبتوں میں انتہائی جل...

को

  कब तलक हाल-ए-दिल छुपाएँ हम अब तो आ जायें आप अयादत को کب تلک حالِ دل چھپائیں ہم اب تو آ جائیں آپ عیادت کو — नज़र نظر अयादत - मरीज़ का हाल पूछना

कोई नहीं है ( ग़ज़ल )

सारी दुनिया में कहीं कोई नहीं है आप जैसी नाज़्नीं कोई नहीं है ساری دنیا میں کہیں کوئی نہیں ہے آپ جیسی نازنی کوئی نہیں ہے चाँद,जन्नत,फूल,तितली या कोई हूर आप से बढ़कर हसीं कोई नहीं है چاند،جنّت،پھول،تتلی یا کوئی ہور آپ سے بڑھکر حسیں کوئی نہیں ہے हमने देखा सोचा और तब जा के पाया आप जैसी दिल-नशीं कोई नहीं है ہمنے دیکھا سوچا اور تب جا کے پایا آپ جیسی دل نشیں کوئی نہیں ہے छोटे बच्चे,बारिशें और ईद का चाँद ? हमने बोला ना नहीं कोई नहीं है چھوٹے بچّے،بارشیں اور عید کا چاند ؟ ہمنے بولا ما نہیں کوئی نہیں ہے इंतिहाई दिल-कशी हैं आप जानाँ आपसे चीं-बर-जबीं कोई नहीं है انتہائی دلکش ہیں آپ جاناں  آپسے چیں-بر-جبیں کوئی نہیں ہے आपके लहज़े से है ख़ुशबू गुलों में आपके बिन यासमीं कोई नहीं है آپکے لحظے سے ہے خوشبو گلوں میں  آپکے بین یاسمیں کوئی نہیں ہے आपकी सूरत है हिन्दुस्ताँ के जैसी आप जैसी सरज़मीं कोई नहीं है آپکی صورت ہے ہندوستاں کے جیسی آپ جیسی سرزمیں کوئی نہیں ہی ― नज़र نظر नाज़्नीं - Attractive, lovely दिल-नशीं - Pleasing इंतिहाई - Extreme दिल-कशी - Attractive चीं-बर-जबीं - Creased Eyebrows ,परेशान हो...

हूँ मैं ( ग़ज़ल )

बिना तेरे सैलाब हूँ मैं जो तू है तो मेहराब हूँ मैं بنا تیرے سیلاب ہوں میں جو تو ہے تو محراب ہوں میں रक़ीबों पे तेज़ाब हूँ मैं तेरा जब से महताब हूँ मैं رقیبوں پے تیزاب ہوں میں تیرا جب سے مہتاب ہوں میں अब और कितना ख़ुश-बख़्त होता मेरे ख़ाब का ख़ाब हूँ मैं اب اور کتنا خوش بخت ہوتا میرے خان کا خان ہوں میں तेरा साया जब तक है मुझ पर मेरी जान शादाब हूँ मैं تیرا سایہ جب تک ہے مجھ پر میری جان شاداب ہوں میں सड़क पर पड़ा संग था मैं तुझे छू के नायाब हूँ मैं سڑک پر پڑا سنگ تھا میں تُجھے چھو کے نایاب ہوں میں तुम अब जिस्म-ओ-जाँ से हो मेरी सुनाने को बेताब हूँ मैं تم اب جسم و جاں سے ہو میری سنانے کو بیتاب ہوں میں ― नज़र نظر सैलाब - A Flood मेहराब - The principal place in the mosque where the priest reads prayer   रक़ीबों - Rivals महताब - Moon ख़ुश-बख़्त - Lucky शादाब - Verdant , हरा-भरा संग - Stone , पत्थर

नहीं ( ग़ज़ल )

बग़ैर उनके आज तक कोई महल बना नहीं वो दफ़्न आह-ओ-दर्द जो किसी तलक गया नहीं بغیر اُنکے آج تک کوئی محل بنا نہیں وہ دفن آہ و درد جو کسی تلک گیا نہیں गिला नहीं मगर कई दफ़ा ये बात चुभती है मेरे मिज़ाज का कोई भी दोस्त मिल सका नहीं گلہ نہیں مگر کئی دفعہ یہ بات چبھتی ہے میرے مزاج کا کوئی بھی دوست مل سکا نہیں सितारे हो तो क्या हुआ ,क़तार में खड़े रहो अभी शफ़क़ का वक़्त है कि दिन अभी ढ़ला नहीं ستارے ہو تو کیا ہوا ، قطار میں کھڑے رہو ابھی شفق کا وقت ہے کہ دن ابھی ڈھلا نہیں रुको तमाम वहशतों कि अब भी बाक़ी है उमीद कि आस्था का दीप एक अभी तलक बुझा नहीं روکو تمام وحشتوں کہ اب بھی باقی ہے امید کہ آستھا کا دیپ ایک ابھی تلک بجھا نہیں न जाने तुमसे इश्क़ है ,लगाव है या जाने क्या प' तुमसे दूर होने का कभी भी डर लगा नहीं ن جانے تمسے عشق ہے ، لگاؤ ہے یا جانے کیا پ تمسے دور ہونے کا کبھی بھی ڈر لگا نہیں नए-नए क़दम का लड़खड़ाना भी ज़रूरी है समझने को जहाँ में कोई सीधे दौड़ता नहीं  نئے نئے قدم کا لڑکھڑانا بھی ضروری ہے سمجھنے کو جہاں میں کوئی سیدھے دوڑتا نہیں हज़ार-हा गिले हैं तुमसे और कहा भी है ख़मोश ये और बात हो गई कि तुमने कुछ स...

बह्र-ए-मीर

बह्र-ए-मीर या मात्रिक बह्र :  कई लोगों को बह्र-ए-मीर को समझने में ख़ासी दिक़्क़त आती है जबकि इस बह्र को समझना काफ़ी आसान है ।  मैं अपने हिसाब से इस बह्र को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ शायद कुछ लोगों को मदद मिल सके । जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है यह एक मात्रिक बह्र है इसीलिए इस बह्र में एक शे'र के दोनों मिसरों (पंक्तियों) में मात्राओं की गणना बराबर होती है इसके अलावा हम जानते हैं कि छोटी मात्रा का वज़्न (1) और बड़ी मात्रा का वज़्न (2) लिया जाता है इसके अलावा मात्रा गिराने के नियम भी मान्य हैं ब-शर्त-ए-कि लय भंग न होने पाए । अब बह्र-ए-मीर में हमें यह सुनिश्चित करना है कि शे'र के दोनों मिसरों में मात्राओं की गणना एक बराबर हो यह हमारी पहली शर्त है इसके अलावा यह भी सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि दोनों मिसरों में मात्राओं की सजावट कुछ इस तरह हो कि दोनों मिसरों की लय एक समान बन पाए ,अगरचे अरूज़ की बाक़ी प्रचलित बहरों की तरह इस बह्र में यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि एक शे'र के दोनों मिसरों में एक जैसे अरकान हों ।  उदाहरण के लिए मीर तक़ी मीर का यह प्रचलित शे'र देखें :  पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमा...

ऊला-सानी (ग़ज़ल)

मैं ऊला हूँ तुम सानी हो मैं जीवन तो तुम पानी हो میں اُولا ہوں تم ثانی ہو میں جیون ٹو تم پانی ہو सब कहते हैं तुम चली गई दिल धड़क रहा तुम यानी हो سب کہتے ہیں تم چکی گئی دل دھڑک رہا تم یعنی ہو दिल कहता है धड़कन हो तुम और ज़हन कहे अनजानी हो دل کہتا ہے دھڑکن ہو تم اور ذہن کہے انجانی ہو मैं अमर रहूँगा मर के भी जानाँ तुम मिरी कहानी हो میں عمر رہونگا مر کے بھی جاناں تم میری کہانی ہے ये बात नहीं सच्चाई है तुम मेरे दिल की रानी हो یہ بات نہیں سچّائی ہے تم میرے دل کی رانی ہو इस तौर से जन्नत लिख देना इक शेर में गर बतलानी हो اس طور سے جنّت لکھ دینا  اِک شیر میں گر بطلانی ہو मैं ऊला पाकिस्तानी हूँ तुम सानी हिन्दुस्तानी हो میں اُولا پاکستانی ہوں تم ثانی ہندستانی ہو ― नज़र نظر ऊला - First Line of a She'r सानी - Second Line of a She'r ज़हन - Brain

तेरी बिन्दी ( ग़ज़ल )

तेरी नादान नक़्श-ए-नाज़ और उसपर तेरी बिन्दी कि जैसे पाक धरती पर ख़ुदा का दर तेरी बिन्दी تیری نادان نقشِ ناز اور اُسپر تیری بندی کہ جیسے پاک دھرتی پر خدا کا در تیری بندی मुसीबत ने मुझे चारो तरफ़ से जब भी घेरा है मुझे राहत तेरी सूरत,मेरा परवर तेरी बिन्दी مصیبت نے مُجھے چاروں طرف سے جب بھی گھیرا ہے مُجھے راحت تیری صورت میرا پرور تیری بندی सवेरा भी तेरा चेहरा ,तेरा चेहरा ही शब मुझको मेरा घर है तेरी आँखें ,मेरा दफ़्तर तेरी बिन्दी سویرا بھی تیرا چہرہ ، تیرا چہرہ ہی شب مجھکو میرا گھر ہے تیری آنکھیں ، میرا دفتر تیری بندی भटकता मैं नहीं हरगिज़ किसी भी शय के लाने से किसी ने सामने रख दी मगर दिलबर तेरी बिन्दी بھٹکتا میں نہیں ہرگز کسی بھی شے کے لانے سے کسی نے سامنے رکھ دی مگر دلبر تیری بندی किसी दैर-ओ-हरम ,गिरजे ,गुरूद्वारे सी राहत है कि जैसे ख़ुद सुकूँ आ जाता है बनकर तेरी बिन्दी کسی دیر و حرم گرجے گرو دوارے سی راحت ہے کہ جیسے خد سکوں آ جاتا ہے بنکر تیری بندی तुझे मालूम है किस तौर है क़ातिल तेरी सूरत निगाह-ए-नाज़ है तलवार तो ख़ंजर तेरी बिन्दी تُجھے معلوم ہے کس طور ہے قاتل تیری صورت نگاہِ ناز ہے تلوار تو خنجر...

आँसू ( ग़ज़ल )

देखोगे जब जहाँ में हैं कैसे-कैसे आँसू हल्के लगेंगे लिख लो तुमको तुम्हारे आँसू دیکھو گے جب جہاں میں ہیں کیسے کیسے آنسو ہلکے لگیں گے لکھ کو تمکو تمہارے آنسو मैं घूँट-घूँट करके पीता हूँ मँहगे आँसू आँखों से क़तरा-क़तरा बहते हैं सस्ते आँसू میں گھونٹ گھونٹ کرکے پیتا ہوں مہنگے آنسو آنکھوں سے قطرہ قطرہ بہتے ہیں سستے آنسو जो दिल में दफ़्न थें वो तब्दील हो रहे हैं मर्ज़-ए-फुलाँ-फुलाँ में,एक-एक करके आँसू جو دل میں دفن تھیں وہ تبدیل ہو رہے ہیں مرضِ فلاں فلاں میں ایک ایک کرکے آنسو रखते हैं शक्ल पर हम चेहरे बदल-बदल के चुप्पी,हँसी वगैरह की तरह अपने आँसू رکھتے ہیں شکل پر ہم چہرے بدل بدل کے چپّی ہنسی وغیرہ کی طرح اپنے آنسو ख़ाब-ओ-ख़यालों में भी ख़ुशियाँ नहीं हैं उतनी दफ़ना दिये हैं हमने इस दिल में जितने आँसू خان و خیالوں میں بھی خوشیاں نہیں ہیں اتنی دفنا دیے ہیں حمنے اس دل میں جتنے آنسو नग्में,लतीफ़े,ग़ज़लें कुछ भी न आएँगे काम गिरने पे आ गयें गर सारे के सारे आँसू نغمے لطیفے غزلیں کُچھ بھی نہ آئیں گے کام گرنے پے آ گئیں گر سارے کے سارے آنسو लश्कर खड़े हैं दुख के,ख़तरे में ज़हन है सो दिल से निक...

नहीं बदला ( ग़ज़ल )

जो मेरे घर से उसके घर को जाता था नहीं बदला बहुत बदले नज़ारे पर वो इक रस्ता नहीं बदला جو میرے گھر سے اسکے گھر کو جاتا تھا نہیں بدلا بہت بدلے نظارے پر وہ اِک رستہ نہیں بدلا दशक बदला सड़क बदली मकाँ बदला मकीं बदले मगर उस कूचे में दिल का सहम जाना नहीं बदला دشک بدلا سڑک بدلی مکاں بدلا ملیں بدلے مگر اس کوچہ میں دل کا سحم جانا نہیں بدلا तेरी सूरत के जानिब था तेरी सूरत के जानिब है तुझे किस तौर समझाएँ मेरा क़िबला नहीं बदला تیری صورت کے جانب تھا تیری صورت کے جانب ہے تُجھے کس طور سمجھائیں میرا قبلہ نہیں بدلا वो दुख जो कल को होता था वही अब तक को बैठा है बहुत शहर-ओ-मकाँ बदले प' सिरहाना नहीं बदला وہ دُکھ جو کل کو ہوتا تھا وحی اب تک کو بیٹھا ہے بہت شہر_و_مکاں بدلے پ سرہانہ نہیں بدلا ख़ुदा को जिसने पहली मर्तबा देखा सभी बदले भरी महफ़िल तेरा दीवाना इकलौता नहीं बदला خدا کو جسنے پہلی مرتبہ دیکھا سبھی بدلے بھری محفل تیرا دیوانہ اکلوتا نہیں بدلا भला हम किस तरह पागल उसे महसूस करने को जो मुद्दत से कोई कमरा कोई कोना नहीं बदला بھلا ہم کس طرح پاگل اُسے محسوس کرنے کو جو مدت سے کوئی کمرہ کوئی کونا نہیں بدلا हमारे दा...

तुम्हें भूल जाना है सब ( ग़ज़ल )

#ghazal जो हरा में सूखा है सब , तुम्हें भूल जाना है सब वो जो तुम में मुझ सा है सब ,तुम्हें भूल जाना है सब جو ہرا میں سوکھا ہے سب ، تمہیں بھول جانا ہے سب وہ جو تم میں مجھ سا ہے سب ، تمہیں  بھول جانا ہے سب कहीं हो न फिर नदामत सो हिसाब से ही रोना ये जो रोना-वोना है सब , तुम्हें भूल जाना है सब کہیں ہو نہ پھر ندامت سو حساب سے ہی رونا یہ جو رونا وونا ہے سب، تمہیں بھول جانا ہے سب मुझे हासिल-ए-मरासिम की है परवा तुमको क्यूँ हो मुझे काम लाना है सब ,तुम्हें भूल जाना है सब مجھے حاصلِ مراسم کی ہے پروا تمکو کیوں ہو مجھے کام لانا ہے سب ، تمہیں بھول جانا ہے سب वो ही फर्क़ आज है जो, वही बाद-ए-हिज्र होगा मुझे याद रखना है सब ,तुम्हें भूल जाना है सब وہ ہی فرق آج ہے جو وحی بادِ ہجر ہوگا مجھے یاد رکھنا ہے سب ، تمہیں بھول جانا ہے سب ग़म-ए-हिज्र है तो क्या है वही तौर-ए-अम्ल होगा मुझे पार पाना है सब , तुम्हें भूल जाना है सब غمِ ہجر ہے تو کیا ہے وحی طورِ عمل ہوگا مجھے پار پانا ہے سب ، تمہیں بھول جانا ہے سب तुम अभी हमारे दुख से हो अगरचे ग़म में लेकिन हमें ज़ब्त करना है सब , तुम्हें भूल जाना...

से पहले ( ग़ज़ल )

शरीफ़-ओ-बा-मुरव्वत शख़्स थें इबलीस से पहले वली-ज़ाहिद हुआ करते थें हम इक टीस से पहले شریف_و_با مروّت شخص تھیں ابلیس سے پہلے ولی زاہد ہوا کرتے تھیں ہم اک ٹیس سے پہلے तुम्हें गर ख़ुद-कुशी करनी है तो ख़ुद की तो होने दो तुम्हारा हक़ नहीं है ज़िन्दगी पर बीस से पहले تمہیں گر خودکشی کرنی ہے تو خود کی تو ہونے دو تمہارا حق نہیں ہے زندگی پر بیس سے پہلے  बहुत बदलाव आएँगे तुम्हारे ज़हनो-दिल में दोस्त तुम्हें आगाह करता हूँ मैं उम्र-ए-तीस से पहले بہت بدلاؤ آئینگے تمہارے ذہن_و_دل میں دوست تمہیں آگاہ کرتا ہوں میں عمر_تیز سے پہلے  अभी तो साल है इक्कीस अभी क्यूँ बो रहे हो बीज फ़ज़ा यूँ ही रहेगी जान-ए-मन चौबीस से पहले ابھی تو سال ہے اکّیس ابھی کیوں بو رہے ہو بیج فضا یوں ہی رہیگی جان_من چوبیس سے پہلے बहुत तब्दीलियाँ हैं याँ सँभलने की ज़रूरत है वो ही जो उम्र आती है 'नज़र' उन्नीस से पहले بہت تبدیلیاں ہیں یاں سنبھالنے کی ضرورت ہے وہ ہی جو عمر آتی ہے 'نظر' انّیس سے پہلے — नज़र نظر बा-मुरव्वत - Kind इबलीस - Devil वली - Saint  ज़ाहिद - One who stays away from evil टीस - A shooting pain

नहीं साहब ( ग़ज़ल )

तेज़ खंज़र है ख़त नहीं साहब आप भी पर ग़लत नहीं साहब تیز خنزر ہے خت نہیں صاحب آپ بھی پر غلط نہیں صاحب हमको लम्हा-ए-ज़ीस्त करने हैं कम हमको सिगरट की लत नहीं साहब ہمکو لمحہ_زیست کرنے ہیں کم ہمکو سگرٹ کی لت نہیں صاحب इक मुसलसल अज़ाब है हम तक ज़ीस्त की अहमियत नहीं साहब اِک مسلسل عذاب ہے ہم تک زیست کی اہمیت نہیں صاحب यादें बरसाएँ न अब हमारे घर  कोई दीवार-ओ-छत नहीं साहब یادیں برسائیں ن اب ہمارے گھر کوئی دیوار_و_چھت نہیں صاحب बाँटने आये हैं हमारे ग़म आप आपकी हैसियत नहीं साहब بانٹنے آئے ہیں ہمارے غم آپ آپکی حیثیت نہیں صاحب कहता है दिल कि बे-वफ़ा हो जा कहती है तरबियत , नहीं साहब کہتا ہے دل ک بے وفا ہو جا کہتی ہے تربیت ، نہیں صاحب सुकूँ मिलता है नेकी करके हमें आरज़ू-ए-सिफ़त नहीं साहब سکوں ملتا ہے نیکی کرکے ہمیں آرزو_سفر نہیں صاحب  कोई पूछे तो काश कह पाते नहीं , कुछ ख़ैरियत नहीं साहब کوئی پوچھے تو کاش کہ پاتے نہیں ، کچھ خیریت نہیں صاحب अपनी उजलत को हैं 'नज़र' मजबूर कोई मसरूफ़ियत नहीं साहब اپنی عجلت کو ہیں نظر مجبور  کوئی مصروفیت نہیں صاحب — नज़र نظر ज़ीस्त - Life मुसलसल - Continuous अज़ाब - Tormant,...

करते नहीं ( ग़ज़ल )

बच्चों के इश्क़ छुपा करते नहीं धुआँ-ए-सब्ज़ दबा करते नहीं بچوں کے عشق چھپا کرتے نہیں دھواں_سبز دبا کرتے نہیں चश्म-ए-धोका है नज़ारा साहब धरती-आकाश मिला करते नहीं چشم_دھوکا ہے نظارہ صاحب دھرتی آکاش ملا کرتے نہیں ख़्वाहिशों पर रखो तुम क़ाबू ज़ियाद जिस्म मर्दों के बिका करते नहीं خواہشوں پر رکھو تم قابو زیاد جسم مردوں کے بکا کرتے نہیں  तुमने इस तौर से अपना ही किया वरना हम तुमसे गिला करते नहीं تم نے اس طور سے اپنا ہی کیا ورنہ ہم تمسے گلا کرتے نہیں हवा है ज़िन्दगी शम्मों की मगर तूफ़ाँ में शम्मे जला करते नहीं ہوا ہے زندگی شمّوں کی مگر طوفاں میں شمّے جلا کرتے نہیں कैसे मानूँ कि नहीं होता नसीब सभी गुल रब पे सजा करते नहीं کیسے معنوں کِ نہیں ہوتا نصیب سبھی گل رب پے سجا کرتے نہیں तूफ़ाँ बतलाती है कैसी है जड़ें जड़ें वैसे तो दिखा करते नहीं طوفاں بتلاتی ہے کیسی ہے جڑیں جڑیں ویسے تو دکھا کرتے نہیں इतनी शिद्दत से भी चाहो न मुझे बे-वफ़ा लोग वफ़ा करते नहीं اتنی شدّت سے چاہو نہ مجھے بے وفا لوگ وفا کرتے نہیں सबको दिखलाओ चमक अपनी 'नज़र' अब्र से शम्स बुझा करते नहीं صبکو دکھلاؤ چمک اپنی 'نظر' ابر سے شمس بجھ...

बे-वफ़ा ( ग़ज़ल )

इस क़दर इश्क़ का सिला देता  एक मुद्दत तलक नहीं सोता اس قدر عشق کا صلہ دیتا ایک مدّت تلک نہیں ستا फिर तेरा नाम जपता रहता मैं  नींद की गोलियाँ नहीं लेता پھر تیرا نام جپتا رہتا میں نیند کی گولیاں نہیں لیتا ज़िक्र महफ़िल में तेरी होती तब आज की तरह मैं नहीं रोता ذکر محفل میں تیری ہوتی تب آج کی طرح میں نہیں روتا तुझपे दीवान-ए-ख़ास लिखता मैं नाम तेरा यूँ ही नहीं खोता تُجھ پے دیوان_خاص لکھتا میں نام تیرا یوں ہی نہیں کھویا तुझको दिलवाता ओहदा-ए-हीर बीज नफ़रत के यूँ नहीं बोता تُجھکو دلواتا اوہدا_ہیر بیج نفرت کے یوں نہیں بوتا क़ज़ा होती मेरी तब इक पल जो  तू मेरी साँस में नहीं आता قضا ہوتی میری تب اک پل جو تو میری سانس میں نہیں آتا दर्द-ए-अफ़ज़ल भी हँस के सहता 'नज़र' तू अगर बे-वफ़ा नहीं होता درد_افضل بھی ہنس کے سہتا نظر تو اگر بے وفا نہیں ہوتا — नज़र نظر  दीवान - Collection of Ghazals क़ज़ा - Death अफ़ज़ल - Superior/Prime, सबसे उत्कृष्ट

करके ( ग़ज़ल )

इक तवाज़ुन सा रख बना करके  ख़ुशी में ग़म ज़रा मिला करके  اِک توازن سا رکھ بنا کرکے  خشی میں غم ذرا ملا کرکے ख़ुदा से आपकी दुआ करके रखें'गे आपको ख़ुदा करके خدا سے آپکی دعا کرکے رکھیں گے آپکو خدا کرکے आपके रूह में उतरना है ख़्वाहिश-ए-जिस्म को फ़ना करके آپکے روح میں اترنا ہے خواہش_جسم کو فنا کرکے जीते जी गर उतर न पाएँ तो जिस्म से जान को रिहा करके جیتے جی گر اتر نہ پائیں تو  جسم سے جان کو رہا کرکے इश्क़ की इक मिसाल देंगे हम  इश्क़ से इश्तिहा जुदा करके  عشق کی اک مثال دینگے ہم عشق سے اشتہا جدا کرکے हासिल-ए-ज़ीस्त है हमारा ग़ैन  साथ में मीम को लगा करके   (حاصل_زیست ہے ہمارا غیں (غ ساتھ میں میم (م) کو لگا کرکے ख़ुद पे ले लेंगे तूफ़ाँ जो रख दे आपकी आबरु बुझा करके  خد پے لے لینگے طوفاں جو رکھ دے آپکی آبرو بجھا کرکے चाँद को चूर-चूर करना है आपके अक्स को दिखा करके  چاند کو چور چور کرنا ہے  آپکے عکس کو دکھا کرکے आपकी जब्र का सिला होगा  उम्र भर आपको हँसा करके آپکی جبر کا صلہ ہوگا عمر بھر آپکو ہنسا کرکے आपको जगमगाता रक्खेंगे अपनी हर शय तलक जला करके...

बचपना (ग़ज़ल)

मैं सोचूँ भी तो क्या इस मरहले से शिफ़ा पाऊँ तो फिर किस रास्ते से میں سوچوں بھی تو کیا اس مرحلے سے شفاء پاؤں تو پھر کس راستے سے भला मैं कैसे संजीदा हो जाऊँ उसे उल्फ़त है मेरे बचपने से بھلا میں کیسے سنجیدہ ہو جاؤں اُسے اُلفت ہے میرے بچپنے سے मैं राज़ी हूँ जो फिर तुम चाहती हो मैं लुट जाऊँगा पर इस सिलसिले से میں راضی ہوں جو پھر تم چاہتی ہو  میں لٹ جاؤنگا پر اس سلسلے سے ख़ुशी क्या चीज़ है और क्या सवेरा भला क्या पूछना इक रतजगे से خشی کیا چیز ہے اور کیا سویرا بھلا کیا پوچھنا اک رتجگے سے सुनो इक बात कहनी है ज़रूरी न उलझा कर मुझ ऐसे मनचले से سنو اک بات کہنی ہے ضروری نہ اُلجھا کر مجھ ایسے منچلے سے किसी भी मसअले पर चुप्पी उसकी मुझे है मसअला इस मसअले से کسی بھی مسئلے پر چپّی اسکی  مجھے ہے مسئلہ اس مسئلے سے न मुम्किन सर जो करना हो तो कह दो तुम अपने में निहाँ इक सिरफ़िरे से نہ مُمکن سر جو کرنا ہو تو کہ دو تم اپنے میں نہاں اک سرفرے سے किसी से पूछ मत राज़-ए-तबाही वो चाहे खुल के हो या वसवसे से کسی سے پوچھ مت راز_تباہی وہ چاہے کھل کے ہو یا وسوسے سے मुहब्बत है तबाही या है तौफ़ीक़ 'नज़र' मत पूछना इक दिलजले ...