काश वो दौर फिर से आ जाए' ( नज़्म )
'काश वो दौर फिर से आ जाए' ( नज़्म ) नौकरी मिल सके कोई अच्छी एक अरसे तलक पढ़ाई की इम्तिहाँ-इम्तिहाँ थी ज़िंदगी बस इसके आगे न हमको कोई ख़बर सिवा इसके न कुछ भी सोचा कभी सिवा इसके न कुछ किया ही कभी शौक़ इस सिलसिले में मर रहे थे यानी जीने में कुछ मज़ा नहीं था सालहा-साल बस मशक़्क़त की सालहा-साल बस यूँ ही गुज़रे एक छोटे से कमरे में हमने एक सूरज को ख़ाक कर डाला एक दुनिया सवार सकता था जो अपनी ग़फ़लत से सब बदल डाला जिस्म जो इक मिसाल होती थी आज कर डाला है धुआँ हमने इक हिमालय को रफ़्ता-रफ़्ता 'नज़र' गोया कर डाला है कुआँ हमने कुछ अलग कर भी लेते शायद हम कुछ नया लिख भी देते शायद हम हर घड़ी पर वही मलाल-ओ-ख़याल काश वो तौर फिर से आ जाए काश वो दौर फिर से आ जाए अपनी गलियों के शाहज़ादे थे हम चश्म-ओ-पेशानी पर चमक थी अलग कोई खाता था रश्क हमसे और कोई कहता था ध्रुव तारा हमें आज सब कुछ मगर अलग है बहुत आज डरते हैं उस गली से हम जिस मक़ाम और छवि पर चढ़कर कल आसमाँ तक को जगमगाते हम आज बीते हुए मक़ाम को मेज़ और माज़ी के छवि को रस्सी बना हमने लटका दिया है ख़ुद को वहीं वहीं जिन गलियों के सितारे थे हम वहीं जिनके कि शाहज़ा...