लड़कियाँ ( ग़ज़ल )
कैसे पाला ,क्या सिखाया , क्या बना दी लड़कियाँ दिल से खेला करती हैं अम्मी तुम्हारी लड़कियाँ आँखों से मासूम और लफ़्ज़ों से भोली भाली सीं घर पे यूँ ही दिखती हैं सारी की सारी लड़कियाँ इश्तिहा बस इश्तिहा और इश्तिहा बस इश्तिहा इसको छोड़ा उसको लूटा उफ़ री भोली लड़कियाँ नाज़ुक-ओ-नादान तूने शक्ल तो दी है ख़ुदा दिल से पर हैवान हैं तेरी बहोत सी लड़कियाँ दस बहाने कर के बहिर सो के आतीं यार संग कैसे कह दूँ इन गटर के कीड़ों को भी लड़कियाँ आइनों के बस में हो तो आइना भी टूट जाए मुस्कुरातीं होंगी जब उनमे फ़रेबी लड़कियाँ इश्क़ की ऊँची दलीलें कैसे देती हैं 'नज़र' बे-वफ़ा और बे-क़दर चमड़ी से लिपटी लड़कियाँ ― नज़र इश्तिहा - Lust , Hunger