लिख रहे हैं ( ग़ज़ल )
तेरी चाह थी तो सनम लिख रहे हैं , ग़ज़ल इक मुकम्मल लो हम लिख रहे हैं । ये ख़ाहिश नहीं थी कि रोऊँ कलम से , मगर देख लो चश्म ए नम लिख रहे हैं । मोहब्बत है तुमसे मेरी जान इतनी , कि बस तेरी ख़ातिर ये ग़म लिख रहे हैं । ग़ज़ल में तुम्हे रात दिन लिख रहे हैं , ख़ुदा की ही थी जो करम , लिख रहे हैं । है रंगत परी सी , अदा हीर सी है , मगर हम उसे फिर भी कम लिख रहे हैं । मेरी ज़िन्दगी में वो आयी है जबसे , मोहब्बत पे तब से कलम लिख रहे हैं । 'नज़र' टूटता है ख़ा'मोशी से तेरी , ये इक मसअला हम अहम लिख रहे हैं । — नज़र चश्म ए नम - Wet Eyes