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सरेआम

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ग़मों को है देखो बिखेरा सरेआम , सियाही से खुल के मैं रोया सरेआम , हिकायत हक़ीक़त में उलझे रहे सब , समझ के भी कोई न समझा सरेआम । ― नज़र हिकायत - Story