सफ़ल हैं ज़िन्दगी में आप (नज़्म)
मैं जानता हूँ ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहना इक ज़रूरी अम्ल है
मैं जानता नहीं फ़क़त, मैं मानता भी हूँ कि ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहना चाहिए
मगर मैं फिर से कहता हूँ , ये आगे बढ़ते रहना है ज़रूरी ज़हन-ओ-सोच का
ज़मीर का ,नज़रिए का
नज़रिया एक ये भी है कि क़ैद कर परिन्दे को वो सब दो जिसके वास्ते वो जी रहा
मगर फिर ऐसा क्यूँ है वो, तुम्हारे पिंजरा खोलते ही तुमको छोड़ जाता है
नज़रिया एक ये भी है कि रोज़ इक परिन्दे को दिया करो ख़ुराक-ओ-प्यार
अजब नहीं वो तुमसे दूर जाने के बजाए पास आएगा
यही तो है ना सोच का,विचार का,नज़रिए और ज़हन का सहीह मायने में आगे बढ़ना फिर
नज़रिया एक ये भी है कि धर्म इक तुम्हारा ही सहीह और सच है बस
कोई भी ग़ैर धर्म है मज़ाक-ओ-झूठ सा तुम्हारे वास्ते
नज़रिया एक ये भी है कि जाति-धर्म कुछ नहीं
हर एक फ़र्द की वही बनावट और चाल है
बनाने वाले ने तो एक फ़र्क़ तक किया नहीं
तो तुमने जाति-धर्म का मुखौटा क्यूँ लगा लिया
अना ये कैसी है,तुम्हारी धारणा ही सच है बस
अना ये कैसी है कि हम अलग-अलग पर एक हैं
नज़रिया एक ये भी है पुरानी मान्यताओं को बिना किसी सवाल और जवाब के
बिना सहीह और ग़लत की तहक़ीक़ात तक किये,
बे-अक़्ल बन के मानते रहो फ़क़त
मगर फिर अक्लमंद बनके घर का नाम भी करो
नज़रिया एक ये भी है जो चलते आ रहा वही सहीह हो कोई ज़रूरी तो नहीं
हमारे पास अक़्ल है तमाम मान्यताओं को समझ के अम्ल करने का
हमारे पास अक़्ल है तभी तो जानवर से अलहिदा हैं हम
हमारी श्रेष्ठता हमारी अक़्ल-ओ-सोच है फ़क़त
वगरना कितने जानवर तो हमसे शक्तिशाली और चुस्त हैं
नज़रिया एक ये भी है कि इंतिक़ाम लेना भी ज़रूरी है
जो कल को हम ख़मोश थे तो तुमने जो भी बद-सुलूकी की हमारे साथ में
अभी जो तुम शरीफ़ और ख़मोश हो
तुम्हारे एक-एक बद-सुलूकी का हिसाब लेंगे हम
नज़रिया एक ये भी है कि इंतिक़ाम ना कभी भी था सहीह और ना कभी सहीह होगा ही
मगर हमारा हक़ है अपने हक़ के वास्ते लड़ें
बजाए सर झुका के बस खड़े रहें
बजाए सामने फिर अंधकार हो या कोई आँधी-तूफ़ाँ हो
मगर जब ऐसे वक़्त रह गयें हों हम ख़मोश अगर
तो अंधकार और आँधियों के बाद आये बे-क़सूर उन उजालों से
वो मरहमी नसीम और मौसम-ए-बहार से
धनक से और पंछियों के पुर-सुकूँ पुकार से
हमारा कोई हक़ नहीं है इंतिक़ाम लेने का
नज़रिया और सोच ख़ैर जो भी जैसा भी हो बस
नज़रिए सोच-ओ-ज़हन को मुसलसल आगे बढ़ते रहना चाहिए
हमारे आज का वज़ूद गर हमारे गुज़रे अम्ल से हो शर्मसार और
हम आदतन हमारे उस वज़ूद को मिटाने में हों मुब्तिला
तो मुस्कुराइए , ख़ुशी मनाइए , बधाई हो !
बिना किसी भी शक़-शुबा ये मानिए
सफ़ल हैं ज़िंदगी में आप
— नज़र
سَفَل ہیں زِندگی میں آپ (نَظم)
میں جانتا ہوں زِندگی میں آگے بڑھتے رہنا اِک ضروری عمل ہے
میں جانتا نہیں فقط، میں مانتا بھی ہوں کہ زِندگی میں آگے بڑھتے رہنا چاہیے
مگر میں پھر سے کہتا ہوں، یہ آگے بڑھتے رہنا ہے ضروری ذہن و سوچ کا
ضمیر کا، نظریے کا
نظریہ ایک یہ بھی ہے کہ قید کر پرندے کو وہ سب دو جس کے واسطے وہ جی رہا
مگر پھر ایسا کیوں ہے وہ، تمہارے پنجرہ کھولتے ہی تم کو چھوڑ جاتا ہے
نظریہ ایک یہ بھی ہے کہ روز اِک پرندے کو دیا کرو خوراک و پیار
عجب نہیں وہ تم سے دور جانے کے بجائے پاس آئے گا
یہی تو ہے نا سوچ کا، وچار کا، نظریے اور ذہن کا صحیح معنی میں آگے بڑھنا پھر
نظریہ ایک یہ بھی ہے کہ دھرم اِک تمہارا ہی صحیح اور سچ ہے بس
کوئی بھی غیر دھرم ہے مذاق و جھوٹ سا تمہارے واسطے
نظریہ ایک یہ بھی ہے کہ ذات-دھرم کچھ نہیں
ہر ایک فرد کی وہی بناوٹ اور چال ہے
بنانے والے نے تو ایک فرق تک کیا نہیں
تو تمنے جاتِ دھرم مکھوٹا کیوں لگا لیا
انا یہ کیسی ہے، تمہاری دھارنا ہی سچ ہے بس
انا یہ کیسی ہے کہ ہم الگ الگ پر ایک ہیں
نظریہ ایک یہ بھی ہے پرانی مانیتاؤں کو بغیر کسی سوال اور جواب کے
بغیر صحیح اور غلط کی تحقیقات تک کیے،
بے عقل بن کے مانتے رہو فقط
مگر پھر عقلمند بن کے گھر کا نام بھی کرو
نظریہ ایک یہ بھی ہے جو چلتے آ رہا وہی صحیح ہو کوئی ضروری تو نہیں
ہمارے پاس عقل ہے تمام مانیتاؤں کو سمجھ کے عمل کرنے کا
ہمارے پاس عقل ہے تبھی تو جانور سے الگ ہیں ہم
ہماری شریشٹھتا ہماری عقل و سوچ ہے فقط
وگرنہ کتنے جانور تو ہم سے طاقتور اور چست ہیں
نظریہ ایک یہ بھی ہے کہ انتقام لینا بھی ضروری ہے
جو کل کو ہم خاموش تھے تو تم نے جو بھی بد سلوکی کی ہمارے ساتھ میں
ابھی جو تم شریف اور خاموش ہو، تمہارے ایک ایک بد سلوکی کا حساب لیں گے ہم
نظریہ ایک یہ بھی ہے کہ انتقام نہ کبھی بھی تھا صحیح اور نہ کبھی صحیح ہوگا ہی
مگر ہمارا حق ہے اپنے حق کے واسطے لڑیں
بجائے سر جھکا کے بس کھڑے رہیں
بجائے سامنے پھر اندھکار ہو یا کوئی آندھی طوفاں ہو
مگر جب ایسے وقت رہ گئیں ہوں ہم خموش اگر
تو انڈھکار اور آندھیوں کے بعد آئے بے قصور اُن اُجالوں سے
وہ مرحمی نسیم اور موسمِ بہار سے
دھنک سے اور پنچھیوں کے پر سکوں پوکر سے
ہمارا کوئی حق نہیں ہے انتقام لینے کا
نظریہ اور سوچ خیر جو بھی جیسا بھی ہو بس
نظریے سوچ و ذہن کو مسلسل آگے بڑھتے رہنا چاہیے
ہمارے آج کا وجود ہر ہمارے گزرے عمل سے ہو شرمسار اور
ہم عادتاً ہمارے اُس وجود کو مٹانے میں ہوں مبتلا
تو مسکرائیے، خوشی منائیے، بدھائی ہو!
بغیر کسی بھی شک شبہ کے مانیے
سَفَل ہیں زِندگی میں آپ
— نَظر
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