दाम ए साहिल (ग़ज़ल)
दाम ए साहिल में है जैसे सफ़र मेरा ,
या इलाही किस तरफ़ है शहर मेरा ।
ना ये दुनिया ना ही मैं ख़ुद मिरे बस में ,
तू किधर फिर जा रहा है डगर मेरा ।
नागवारा हो तुम्हें पर ये तो सच है ,
तेरे हर-शय पे है छाया असर मेरा ।
मेरे शब शाम ओ सहर भी दिखे तो हैं ,
पर अभी तो बाक़ी है दोपहर मेरा ।
ना तो सूरज ना सितारा ज़मी का मैं ,
फिर क्यूँ लगती तू है जैसे क़मर मेरा ।
मेरी आँखों में ज़रा भी नहीं दिखती ,
पर ये सच है वो है शामो सहर मेरा ।
चाँद को देख मैं उठा हूँ मगर सुन लो ,
ये नहीं है इन्तेहा - ए - लहर मेरा ।
मेरी ख़ाहिश है कि दुबला रहूँ मैं तब ,
जो जले शव गर चिता पे 'नज़र' मेरा ।
— नज़र
दाम-ए-साहिल - Trap of coast ( किनारे का जाल )
ना-गवारा - Not Acceptable
हर-शय - Everything
शब - Night
सहर - Morning
क़मर - Moon
इन्तेहा-ए-लहर - Limit of waves
शव - Dead Body ,लाश
Explanation for last sher :
*For them who have never been to shamshan*
मेरी ख़ाहिश है कि दुबला रहूँ मैं तब ,
जो जले शव गर चिता पे 'नज़र' मेरा ।
— नज़र
” लाश जितनी दुबली होगी, जलने में उतना कम वक्त लगेगा , और वहाँ आये लोगों को समान्य से कम वक्त तक वहाँ खड़ा रहना होगा , तो उन्हें मेरी लाश की वज़ह से कम तक़लीफ़ उठानी होगी । तो इसलिए मेरी ये ख़्वाहिश है कि मैं जब मरूँ तो दुबला सा रहूँ , ताकि मेरी लाश की वज़ह से भी लोगों को ज़्यादा परेशानी ना हो । ”
या इलाही किस तरफ़ है शहर मेरा ।
ना ये दुनिया ना ही मैं ख़ुद मिरे बस में ,
तू किधर फिर जा रहा है डगर मेरा ।
नागवारा हो तुम्हें पर ये तो सच है ,
तेरे हर-शय पे है छाया असर मेरा ।
मेरे शब शाम ओ सहर भी दिखे तो हैं ,
पर अभी तो बाक़ी है दोपहर मेरा ।
ना तो सूरज ना सितारा ज़मी का मैं ,
फिर क्यूँ लगती तू है जैसे क़मर मेरा ।
मेरी आँखों में ज़रा भी नहीं दिखती ,
पर ये सच है वो है शामो सहर मेरा ।
चाँद को देख मैं उठा हूँ मगर सुन लो ,
ये नहीं है इन्तेहा - ए - लहर मेरा ।
मेरी ख़ाहिश है कि दुबला रहूँ मैं तब ,
जो जले शव गर चिता पे 'नज़र' मेरा ।
— नज़र
दाम-ए-साहिल - Trap of coast ( किनारे का जाल )
ना-गवारा - Not Acceptable
हर-शय - Everything
शब - Night
सहर - Morning
क़मर - Moon
इन्तेहा-ए-लहर - Limit of waves
शव - Dead Body ,लाश
Explanation for last sher :
*For them who have never been to shamshan*
मेरी ख़ाहिश है कि दुबला रहूँ मैं तब ,
जो जले शव गर चिता पे 'नज़र' मेरा ।
— नज़र
” लाश जितनी दुबली होगी, जलने में उतना कम वक्त लगेगा , और वहाँ आये लोगों को समान्य से कम वक्त तक वहाँ खड़ा रहना होगा , तो उन्हें मेरी लाश की वज़ह से कम तक़लीफ़ उठानी होगी । तो इसलिए मेरी ये ख़्वाहिश है कि मैं जब मरूँ तो दुबला सा रहूँ , ताकि मेरी लाश की वज़ह से भी लोगों को ज़्यादा परेशानी ना हो । ”

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