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आये ( ग़ज़ल )

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मुझको  इक  नींद   मुक्कमल  आये यानी   के   आज   मेरा   कल   आये مجھکو اک نیند مکمّل آئے  یعنی کے آج میرا کل آئے गर न  मुम्किन हो  तिरी सोहबत तो तेरे   कूचे    में   फिर   अजल   आये گر ن ممکن ہو تیری صحبت تو  تیرے کوچے میں پھر اجل آئے बारिशें आये अगर कैसी भी  मुझ तलक फिर वो मुसलसल आये  بارشیں آئے اگر کیسی بھی  مجھ تلک پھر وہ مسلسل آئے बेच   कर   मुल्क़   जो   जीना   आये उससे  बेहतर हो  कि  मक़तल आये بیچ کر ملق کو جینے آئے اُسّے بہتر ہو کہ مقتل آئے स्याह   कुछ  आये   मेरे   चेहरे   पर तो  तेरी  आँखों  का   काजल  आये سیاہ کچھ آئے میرے چہرے پر تو تیری آنکھیں کا کاجل آئے वो  बे-बस तो  हो  मगर  ख़ुश भी  हो इश्क़  में ऐसे भी  कुछ...