ख़ुदा भी न आता मुझे देखने को , है राज़ी मुझे वो भी ख़ुश मानने को । 'नज़र' इस कदर क़ैद हूँ मैं ख़ुदी में , न आता कोई भी मुझे पूछने को । मेरे अश्क बह के ख़ुदी सूखते हैं , न आता कोई भी इन्हें पोछने को । मैं इंसाँ हूँ तो दर्द मुझको भी होगा , ये कहना पड़ेगा तुम्हें सोचने को ? मैं गिरता हूँ तो चोट खाता हूँ अक्सर , कोई भी न आता मुझे थामने को । मेरे लफ्ज़ अश्कों से गीले हैं अब भी , नया क्या है इसमें मगर जानने को । ये ग़ज़लें भी बस साथ रोतीं हैं मेरे , न आतीं कभी चश्म ए नम सोखने को । — नज़र चश्म ए नम - Wet Eyes