चश्म ए नम ( ग़ज़ल )

ख़ुदा  भी न आता मुझे देखने को ,
है राज़ी मुझे वो भी ख़ुश मानने को ।

'नज़र' इस कदर क़ैद हूँ मैं ख़ुदी में ,
न आता कोई भी मुझे पूछने को ।

मेरे अश्क बह के ख़ुदी सूखते हैं ,
न आता कोई भी इन्हें पोछने को ।

मैं इंसाँ हूँ तो दर्द मुझको भी होगा ,
ये कहना पड़ेगा तुम्हें सोचने को ?

मैं गिरता हूँ तो चोट खाता हूँ अक्सर ,
कोई भी न आता मुझे थामने को ।

मेरे लफ्ज़ अश्कों से गीले हैं अब भी ,
नया क्या है इसमें मगर जानने को ।

ये ग़ज़लें भी बस साथ रोतीं हैं मेरे ,
न आतीं कभी चश्म ए नम सोखने को ।

— नज़र


चश्म ए नम - Wet Eyes




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