जा के कहना तुम दुआ को चूमता हूँ मैं ख़ुदा को جا کے کہنا تم دعا کو چومتا ہوں میں خدا کو ज़ीस्त उसमें बंद करके दी है चाबी बस क़ज़ा को زیست اسمے بند کرکے دی ہے چابی بس قضا کو बस वो ही हाँ ,हाँ वो ही बस जा के कह दो हर रज़ा को بس و ہی ہاں٫ ہاں وہ ہی بس جا کے کہ دو ہار رضا کو हिज्र में ज़िन्दा हूँ मैं ख़ुद क्या कहूँ मैं बेवफ़ा को ہجر میں زندہ ہوں میں خد کیا کہوں میں بیوفا کو क़ब्र पे रिश्तों के मैंने हँसते देखा फिर अना को قبر پے رشتوں کے میںنے ہنستے دیکھا پھر انا کو रट रहा है एक ही नाम क्या बताऊँ लापता को رٹ رہا ہے ایک ہی نام کیا بتاؤں لاپتا کو गर वो आए तो बताना रोक रक्खा है क़ज़ा को گر و آئی تو بتانا روک رکھّا ہے قضا کو कश्ती को ही नागवारा क्या कहूँ फिर नाख़ुदा ...