ख़ुदा ( ग़ज़ल )



जा के कहना तुम  दुआ को
चूमता    हूँ    मैं   ख़ुदा   को
جا کے کہنا تم دعا کو
چومتا ہوں میں خدا کو
ज़ीस्त  उसमें   बंद   करके
दी है  चाबी  बस क़ज़ा  को
زیست اسمے بند کرکے
دی ہے چابی بس قضا کو
बस वो ही हाँ ,हाँ वो ही बस
जा के  कह दो हर  रज़ा को
بس و ہی ہاں٫ ہاں وہ ہی بس
جا کے کہ دو ہار رضا کو
हिज्र में ज़िन्दा हूँ मैं ख़ुद
क्या   कहूँ   मैं   बेवफ़ा  को
ہجر میں زندہ ہوں میں خد
کیا کہوں میں بیوفا کو
क़ब्र  पे  रिश्तों  के  मैंने
हँसते देखा फिर अना को
قبر پے رشتوں کے میںنے
ہنستے دیکھا پھر انا کو
रट रहा है एक ही नाम
क्या बताऊँ लापता को
رٹ رہا ہے ایک ہی نام
کیا بتاؤں لاپتا کو
गर   वो  आए   तो   बताना
रोक   रक्खा  है   क़ज़ा  को
گر و آئی تو بتانا
روک رکھّا ہے قضا کو
कश्ती   को   ही   नागवारा
क्या  कहूँ  फिर नाख़ुदा  को
کشتی کو ہی نا گوارا
کیا کہوں پھر نا خدا کو
तुम  लहू में , साँसों  में  तुम
ठग  रहा  हूँ   बस  हवा  को
تم کہو میں ، سانسوں میں تم
ٹھگ رہا ہوں بس ہوا کو
इन्तेहा   गर   दर्द   की   हो
भेजो  मुझ  तक इन्तेहा  को
انتہا گر درد کی ہو
بھیجو مجھ تک انتہا کو
लब  से  मेरे  गुम  है  कबसे
कैसे    ढूँढूँ    गुमशुदा    को
کب سے میرے غم ہے کب سے
کیسے ڈھونڈوں گمشدہ کو
मैं  ज़रा भी  ख़ुश  हुआ  गर
मार   देना  तुम   शिफ़ा  को
میں ذرا بھی خوش ہوا گر
مار دینا تم شفا کو
ये   धड़कता   भी   वहीं   है
क्या   कहूँ  अब  बेहया  को
یہ دھڑکتے بھی وہیں ہے
کیا کہوں آب بے حیا کو
पहले   मुझसे  तुम   गुज़ारो
उसके हर ग़म  हर बला को
پہلے مجھ سے تم گزرو
اسکے ہر غم ہر بلا کو
गर है लाना , उसको  लाओ
ले  के  जाओ  इस  दवा  को
گر ہے لانا ، اسکو لاو
لے کے جاؤ اِس دوا کو
फ़िक्र   इतनी  है   तुम्हें  गर
लाओ ना फिर उस सदा को
فقر اتنی ہی تمھیں گر
لاؤ نا پھر اس عدا کو
सामने  गर   हो  'नज़र'  तो
खोल   देना  हर  जफ़ा   को
سامنے غر ہو ' نذر ' تو
کھول دینا ہر ذفا کو

― नज़र نظر

ज़ीस्त - life
क़ज़ा - Death
रज़ा - Desire
हिज़्र - Separation
अना - Ego
नाख़ुदा - Sailor , Boatman
इन्तेहा - Limit
शिफ़ा - Healing , Recovery
सदा - Voice , आवाज़
जफ़ा - Injustice

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