एक वजह ये भी


उसके हाल एक जैसे ही थे ,जैसे वो घर से बाहर था ,ठीक वैसे ही हाल उसके घर पे भी थे ।
मुसलसल सपने देखा करता था,वहाँ भी और यहाँ भी,मुख़्तसर सी कोशिशें करता था ,वहाँ भी और यहाँ भी। हालांकि,जब वो बाहर था और उसने घर आकर पढ़ाई करने का मन बना लिया था,तब उसके इरादे कुछ और ही थे ,या यूँ कहूं आसमानो पर थे। अपने दोस्तों से जुदा होने के अलावा और कोइ वजह उस वक़्त उसके ज़ेहन ओ दिल मे नही थे ,जो उसके घर पर जा के पढ़ाई करने के पक्ष में ना हो। वो अक्सर अपने दोस्तों को दलीलें दिया करता था और साथ ही में ख़ुद को भी , कि उसके घर जाने का फ़ैसला सही है , वो उनसे अक्सर कहा करता था और शायद ख़ुद से भी ,वहाँ खाने-पीने की कोइ परेशानी नही होगी , ना ही और भी ऐसे-वैसे घर के काम जो फ़िज़ूल में यहाँ हमे करना होता है ,वो तमाम वक़्त भी मैं पढ़ाई में दे पाऊंगा ,और तो और अगर कभी किसी ऐसे-वैसे वजह के कारण पढ़ाई में कोताही बरतुंगा तो माँ-बाबा को देख आत्मग्लानि का एहसास होगा तो ख़ुद फिर से पढ़ाई शुरू कर दूंगा ,और वैसे भी जब मेरी कोचिंग ख़त्म हो चुकी है तो फिर यहाँ रहूँ या घर पर ,क्या फर्क पड़ता है ,ऊपर से घर पर इतने सारे सकारात्मक पहलू भी हैं ।
पर उसके दोस्त अक्सर उससे कहा करते थे ,यहाँ रहेगा तो पढ़ाई के माहौल में रहेगा , कॉम्पिटिशन का पता चलेगा , घर पे कहाँ पता चलता कुछ ,उसपे हमारे छोटे शहर में तो और कुछ पता नहीं लगता।
हालांकि , ये बातें हैं तो सही भी , एक लिहाज़ से देखा जाए तो ,पर इनसे उस लड़के पर ज़ेहनी तौर पर भी कोई फर्क नहीं पड़ा कभी , क्योंकि वो इस बात से बहोत अच्छी तरह से वाकिब था कि यहाँ रहकर भी उसे रहना उसी चार दीवारी में है ,हाँ ,कभी-कभी बाहर की भी हवा लगा लिया करता था ,पर कॉम्पिटिशन देखने के लिए तो नही ,और फिर जब आपने किसी चीज का मन बना लिया हो तो सारे विचार उसके पक्ष में ही आते हैं , तो उसके भी मन ने एक उच्च विचार को उस वक़्त जन्म दिया कि " कॉम्पिटिशन तो ज़ेहन में होता है भला जगह और माहौल का इससे क्या लेना " , और फिर क्या था फिर तो उसके इरादे जैसे सातवें आसमान पे थे और उसने घर जाने का इरादा दृढ़ कर लिया ।
अब वो घर आ चुका था ,और शुरुआत के कुछ दिन वैसे ही गुज़रे जैसा उसने सोच रखा था ,पर फिर हालात बाहर जैसे ही हो गए ,हालाँकि , बाहर भी शुरुआती दौर में उसके कुछ दिन ऐसे ही जोश ओ जुनू में गुज़रे थे । अपनी लापरवाही को देख अब उसे खयाल आने लगा कि कहीं उसके दोस्त ठीक तो नही कह रहे थे ,और उसके मन मे एक दफ़ा फिर से बाहर जाने का खयाल आने लगा , पर क्योंकि वो बाहर रह चुका रहा था तो उसे अपने उस दौर के हालात का भी अच्छी तरह से इल्म था ,तो उसने अपने आप को कुछ देर के लिए मनाया, इससे पहले की उसकी इच्छा बाहर जाने की हो जाए औए फिर वो सारे पहलू अपने बाहर रहने के पक्ष में देखने लगे । उसने ख़ुद से बातें की ,कि क्यों वो घर आके पढ़ना चाहता था ,उस वक़्त उसने ख़ुद को क्या-क्या दलीलें दी थी , और जब उसने इन सब बातों पर सोच विचार किया तो उसमें ज़ेहनी और दिली दोनों तौर से एक साफ़ बदलाव सा दिखने लगा ,वो अगली ही सुबह फिर उसी शिद्दत से पढ़ाई करने लगा । हालांकि , फिर कुछ दिन बाद उसकी हालत पहले जैसी ही हो गयी , पर इन सब से उसे इतना तो इल्म हो गया कि जगह ,स्थान ,माहौल ये सब तो बस कहने की चीज़े हैं ,जो सही मायने में अहम है वो है हमारी विचारधारा  ,हम कैसे सोचते हैं ,हमारे खयालात क्या हैं , या ऐसा कहें –
महज़ ख़याल हैं जो सब बदल देंगे , 
तुम्हारे आज को एक नया कल देंगे , 
जहाँ बुरे तुम्हे  बे-सूद सा कर देंगे , 
वहीं‌ अच्छे हर सवाल का हल देंगे ।
अब उसे इतना तो पता था कि दोष या कमी जगह में नही बल्कि उसमे है ,पर अब भी वो इस बात से परेशान था कि उसे ये तो पता है कमी उसमे है और उसे क्या करना है ,और तो और वो कुछ दिनों तक वैसा कर भी लेता था ,पर कुछ समय बाद हालात फिर बिगर जाते थे,माज़रा अब उसके समझ से परे था।
पर उसके इख़्तियार में कुछ भी नही था,वो हर रात अपने लापरवाही के लिए ख़ुद को कोसता था और अगले सुबह हालात बदस्तूर से हो जाते , उसकी शिद्दत लंबे अर्से तक कभी टिकती ही नही थी।
पर उसको अपनी नाकामी के ग़म से ज्यादा ये ग़म सताया करती थी , कि उसने अपने माँ-बाबा के लिए अब तक कुछ भी नही किया , उसने उन्हें अब तक कुछ भी नही दिया । वो कैसे भी कर के जल्द से जल्द पैसे कमाना चाहता था ताकि वो अपने माँ-बाबा को खुशियां दे सके उन्हें तरह-तरह के उपहार दे सके।और इसीलिए अब उसने बाहर जा कर प्राइवेट जॉब करने का फैसला किया,और ये बात अम्मा-बाबा से भी कही कि वो बाहर प्राइवेट जॉब करने जाना चाह रहा है। माँ-बाबा दोनों बहोत निराश से दिख रहे थे जैसे किसी शजर से हरियाली दूर जा रही हो ,वो उससे ना जाने की गुज़ारिश करने लगे ,इससे उसे बहोत शर्मिंदगी का एहसास हुआ और उसने जाने की वजह माँ को भी बता दी ,इसपर माँ ने हँसते हुए उससे पूछा , अच्छा ये बता इस दुनिया मे सबसे ज्यादा अहमियत किसकी है ? तो उसने जवाब में कहा ,बाकि तो सब कहने की बातें हैं पर सही मायनों में सबसे ज्यादा अहमियत तो पैसों की ही है ,इसपर माँ ने पूछा तूझे नहीं लगता पैसों से भी ज्यादा अहमियत वक़्त की है ? इसपर वो तुरंत मान गया , बोला हाँ ,माँ ये तो है ,मेरे दिमाग मे नही आया , हाँ ,सबसे ज़्यादा अहमियत वक़्त की है । फिर माँ ने उससे तुरंत कहा जब तू सबसे ज्यादा अहमियत वाली चीज़ मुझे दे रहा है तो फिर ये कुछ पैंसों के लिए उसे मुझसे छीनना क्यों चाहता है ? इसमें तो मेरा घाटा ही हुआ ना ? बोल ?
अब शायद उसके पास कहने को कोई शब्द नही थे,वो निशब्द था ,उसने बाहर जाके कोई भी प्राइवेट जॉब करने का विचार तो मन से निकाल ही दिया था और साथ ही इससे अब उसे घर आकर पढ़ाई करने के पक्ष में  एक और सबसे बड़ी वजह भी दिख चुकी थी ।

― नज़र

मुसलसल - Continuous
मुख़्तसर - little 
बे-सूद - Useless
इख़्तियार - control
बदस्तूर - like before
शजर - tree , plant




Comments

Anurag said…
मेरे साथ ऐसा बहुत कम बार हुआ है कि कुछ पढ़ते वक़्त आँखों में आँसू आ गए हों।
While I was in d second last stanza, my eyes were full of tears.

Glad u wrote it. 😍😍
अब क्या कहें हम ... Mixed feelings हैं ,एक तरफ खुशी है कि आपके दिल तक पहुंचा और दूसरी तरफ ग़म इस बात का की आपकी आंखे नम कर गया , and thank you so much for your continuous support and appreciation 😊