शहर (ग़ज़ल)
शहर में धुआँ है धुएँ में शहर है ,
सियायत की देखो अजब ये लहर है ।
हैं ग़ाफ़िल बशिन्दे न कोई ख़बर है ,
लुटेरों के वश में ही होने को घर है ।
ये क़ब्रें खुलीं भी ओ लाशें उठीं भी ,
गुनहगार फिर भी यहाँ बे-फ़िकर है ।
ज़हर है यहाँ भी ज़हर है वहाँ भी ,
मैं कैसे बताऊँ कहाँ कम ज़हर है ।
न ज़द में सितारे न चाहत क़मर की ,
मैं कैसे बताऊँ ये कैसा सफ़र है ।
है रौशन शमा गर तो कैसा अँधेरा ,
अंधेरों का डर है तो कैसी सहर है ।
कोई आईना हो तो समझे वो हमको ,
मुझे रौशनी खल रही किस क़दर है ।
न हालत ही सुधरी न बदली फ़ज़ा ये ,
बताओ तुम्हीं फिर ये कैसा असर है ।
समंदर से हमको शिकायत नही है ,
'नज़र' हमको तेज़ हवाओं से डर है ।
सियायत की देखो अजब ये लहर है ।
हैं ग़ाफ़िल बशिन्दे न कोई ख़बर है ,
लुटेरों के वश में ही होने को घर है ।
ये क़ब्रें खुलीं भी ओ लाशें उठीं भी ,
गुनहगार फिर भी यहाँ बे-फ़िकर है ।
ज़हर है यहाँ भी ज़हर है वहाँ भी ,
मैं कैसे बताऊँ कहाँ कम ज़हर है ।
न ज़द में सितारे न चाहत क़मर की ,
मैं कैसे बताऊँ ये कैसा सफ़र है ।
है रौशन शमा गर तो कैसा अँधेरा ,
अंधेरों का डर है तो कैसी सहर है ।
कोई आईना हो तो समझे वो हमको ,
मुझे रौशनी खल रही किस क़दर है ।
न हालत ही सुधरी न बदली फ़ज़ा ये ,
बताओ तुम्हीं फिर ये कैसा असर है ।
समंदर से हमको शिकायत नही है ,
'नज़र' हमको तेज़ हवाओं से डर है ।
— नज़र
सियायत - Politics
ग़ाफ़िल - Ignorant
ज़द - Reach
सहर - Morning
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