बस और ख़यालात ( A short Story )


कभी-कभी सोचता हूँ ,मैं भी इस बस के तरह हूँ ,
और ये लोग मेरे ख़यालों की तरह ,आपस मे टकराते , लड़ते-झगड़ते ,गुफ़्तगू करते बिल्कुल मेरे ख़यालों की तरह ,अंदर कितनी भी खींचा-तानी हो बाहर से तो बस अगर नई हो तो smooth ही चलती नज़र आती है ,मेरे ख़यालों की ही तरह यहाँ भी हर शख़्स की अपनी अलग परेशानी है , हर शख़्स की अपनी अलग मंज़िल है ,मगर हमे ये पता होना ज़रूरी है कि ये शख़्स बस की मंज़िल नहीं ना ही ये ख़यालात हमारी मंज़िल हैं। कुछ ख़यालात ऐसे भी होंगे जिनकी हम कुछ ज्यादा ही ख़याल करते हैं उन्हें बस की सबसे अच्छी seat देते हैं ,मगर ख़याल जो भी हो कोई एक ख़याल हमारी मंज़िल नही ,इन ख़यालों की मंज़िल आयेगी फिर नए ख़यालात चढ़ेंगे ,मगर हमारी बस किस रास्ते चलेगी,रास्ते में कितने असमतल होंगे ,कितने गड्ढें आयेंगे ये बस का ड्राइवर और हमारे अंदर हमारी आजमाइशों और कोशिशों के ख़यालात तय करते हैं और ये ख़यालात भी , तय ख़यालात नही , हम किसी भी मोड़ पर इसे बदल सकते हैं , बस के किसी ड्राइवर की ही तरह , अगर आज़माइशें और कोशिशें अच्छी होंगी तो बस में धक्के कम लगेंगे ,बाक़ी ख़यालों को भी उनकी मंज़िल पे बेहतर पहुँचा पायेंगे ।
मुम्किन है कि रास्ते में सफ़र के दौरान किसी बस के बहोत से ख़यालात हमारी बस से मिल जायें ,फिर वो बस हमारे रास्ते का साथी बन जाता है ,फिर अगर चंद ख़यालों के रास्ते ज़रा अलग भी होते हैं तो आपस मे बातें कर के दोनो में से कोई एक बस ज़रा रास्ते बदल लेते हैं ताकि रास्ते का साथी ना बिछड़ जाए ,साथ होने से हम एक दूसरे के बस का सहारा बन सकते हैं,किसी मोड़ पर किसी परेशानी या ख़राबी आने के वक़्त ।
मगर ये भी मुम्किन है कि उस साथी बस के कुछ ख़याओं के रास्ते इतने अलग हो कि साथ चलना दोनो के लिए गवारा ना हो , फिर अगर दोनो बसों को साथ चलना हो तो या तो उन ख़यालों को कहीं बे-मंज़िल ही छोड़ना मुनासिब है या फिर बस में ही बिठाये रखना जब तक बस की ख़ुद की मंज़िल ना आ जाये ।
पर अगर उन बसों को उन ख़यालों के साथ समझौता करना मुनासिब नही लगता तो फिर दोनों बसों के रास्ते जुदा हो जाते हैं , और फिर शायद उन ख़यालों को उनकी मज़िल तक पहुँचाने के बाद या बीच मे ही कहीं उतार देने के बाद उन दोनों साथी बसों का मिलना मुम्किन है पर ये भी मुम्किन है कि दोनों बसें अब रास्ते मे किसी और बस के साथ सफ़र कर रही हो या कोई एक बस अकेली भी हो या शायद किस्मत ने चाहा तो फिर से वो ही दोनों बसें एक दूसरे के सफ़र का साथी बन जाती हैं ।

― नज़र

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