परी ( नज़्म )
जानाँ तुम ऐन उसी परी सी हो
चाँद पर बैठ कर जो आती थी
जो मुझे ख़ाब में बचाती थी
दश्त में रास्ता दिखाती थी
भटकूँ तो सामने आ जाती थी
ख़ुशी के बस्ती में ले जाती थी
हँसी के पेड़ों से मिलाती थी
समा का सैर फिर कराती थी
बादलों पर मुझे ले जाती थी
तीरगी से मुझे उठा कर के
रौशनी पर मुझे बिठाती थी
रात में नींद गर न आये मुझे
आके वो लोरियाँ सुनाती थी
मुझसे हर ग़म निकाल जाती थी
मेरी सब ख्वाहिशें समझती थी
बिन कहे सच बना के देती थी
कोई वहशत मुझे सताए तो
उसका वो ख़ून सा पी जाती थी
कोई अपना मुझे रुलाये तो
आके वो आँसू पोछ जाती थी
बिन कहे दर्द जान लेती थी
जादू सा फिर कोई चलाती थी
रो रहे दिल को फिर वो मेरे'नज़र'
गोया इक झटके में हँसाती थी
पुर-कशिश उस सी कोई भी नहीं थी
हमनवा उस सी कोई बन न सकी
ख़ैर ये सब तो इक फ़साना था
हाँ मगर तुम मेरी हक़ीक़त हो
और तुमसे फ़क़त ये कहना है
"जानाँ तुम ऐन उसी परी सी हो"
― नज़र
ऐन - Exactly
दश्त - Forest
समा - heaven,sky
तीरगी - Darkness
हमनवा - Friend, Companion
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