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सफ़ल हैं ज़िन्दगी में आप (नज़्म)

मैं जानता हूँ ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहना इक ज़रूरी अम्ल है  मैं जानता नहीं फ़क़त, मैं मानता भी हूँ कि ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहना चाहिए मगर मैं फिर से कहता हूँ , ये आगे बढ़ते रहना है ज़रूरी ज़हन-ओ-सोच का  ज़मीर का ,नज़रिए का  नज़रिया एक ये भी है कि क़ैद कर परिन्दे को वो सब दो जिसके वास्ते वो जी रहा  मगर फिर ऐसा क्यूँ है वो, तुम्हारे पिंजरा खोलते ही तुमको छोड़ जाता है  नज़रिया एक ये भी है कि रोज़ इक परिन्दे को दिया करो ख़ुराक-ओ-प्यार  अजब नहीं वो तुमसे दूर जाने के बजाए पास आएगा  यही तो है ना सोच का,विचार का,नज़रिए और ज़हन का सहीह मायने में आगे बढ़ना फिर  नज़रिया एक ये भी है कि धर्म इक तुम्हारा ही सहीह और सच है बस  कोई भी ग़ैर धर्म है मज़ाक-ओ-झूठ सा तुम्हारे वास्ते  नज़रिया एक ये भी है कि जाति-धर्म कुछ नहीं  हर एक फ़र्द की वही बनावट और चाल है  बनाने वाले ने तो एक फ़र्क़ तक किया नहीं  तो तुमने जाति-धर्म का मुखौटा क्यूँ लगा लिया अना ये कैसी है,तुम्हारी धारणा ही सच है बस  अना ये कैसी है कि हम अलग-अलग पर एक हैं  नज़रिया एक ये भी है पुरानी मान्यताओं...

जानवर ( नज़्म )

'जानवर' ( नज़्म ) बहुत अजीब दुनिया है हमारी भी यहाँ पे कुत्ते-बिल्लियों का है सलौन यहाँ पे ए.सी. गाड़ियों में घूमते हैं जानवर झुलस-ठिठुर के फ़र्द मर गए पर इंसाँ के यहाँ यहाँ पे थालियों में जूठा छोड़ते हैं जानवर बिलक रहे हैं बच्चे भूक से पर इंसाँ के यहाँ हर एक जानवर को है पता इलाज भूक का वो जानवर हैं और हम इक इंसाँ हैं हमें ये क्यूँ समझ नहीं, हमें ये दिखता क्यूँ नहीं हमारे भूक का इलाज जानवर से है अलग वो जानवर हैं कच्चा-पक्का कुछ भी खा के जीएँ'गे हमें मगर ये सोचना है इंसाँ कैसे जीएँ'गे भला करो,मगर ये याद रक्खो हम हैं इंसाँ ज़ात हमारा फ़र्ज़ बनता है हमारी ज़ात के लिए मगर हमें है फ़िक्र ज़ात और की वो ज़ात जिनको हमसे है लगाव रोटी के लिए वो ज़ात जिसको फ़र्क़ ही नहीं कि शख़्स कौन है खिलाये जो वो प्यार है,बजाए अक्स कौन है किसी भी जानवर को प्यार इतना ही करो 'नज़र' कि बच्चा कोई इंसाँ का ये आरज़ू करे नहीं मैं जानवर ही होता काश!  मैं जानवर ही होता काश!! — नज़र ' جانور ' ( نظم ) بہت عجیب دنیا ہے ہماری بھی یہاں پہ کُتّے بلیوں کا ہے سلوں یہاں پے اے۔ سی ۔ گاڑیوں میں گھومتے ہیں جانور جھ...

काश वो दौर फिर से आ जाए' ( नज़्म )

'काश वो दौर फिर से आ जाए' ( नज़्म ) नौकरी मिल सके कोई अच्छी एक अरसे तलक पढ़ाई की इम्तिहाँ-इम्तिहाँ थी ज़िंदगी बस इसके आगे न हमको कोई ख़बर सिवा इसके न कुछ भी सोचा कभी सिवा इसके न कुछ किया ही कभी शौक़ इस सिलसिले में मर रहे थे यानी जीने में कुछ मज़ा नहीं था सालहा-साल बस मशक़्क़त की सालहा-साल बस यूँ ही गुज़रे एक छोटे से कमरे में हमने एक सूरज को ख़ाक कर डाला एक दुनिया सवार सकता था जो अपनी ग़फ़लत से सब बदल डाला जिस्म जो इक मिसाल होती थी आज कर डाला है धुआँ हमने इक हिमालय को रफ़्ता-रफ़्ता 'नज़र' गोया कर डाला है कुआँ हमने कुछ अलग कर भी लेते शायद हम कुछ नया लिख भी देते शायद हम हर घड़ी पर वही मलाल-ओ-ख़याल काश वो तौर फिर से आ जाए काश वो दौर फिर से आ जाए अपनी गलियों के शाहज़ादे थे हम  चश्म-ओ-पेशानी पर चमक थी अलग कोई खाता था रश्क हमसे और कोई कहता था ध्रुव तारा हमें आज सब कुछ मगर अलग है बहुत आज डरते हैं उस गली से हम जिस मक़ाम और छवि पर चढ़कर कल आसमाँ तक को जगमगाते हम आज बीते हुए मक़ाम को मेज़ और माज़ी के छवि को रस्सी बना हमने लटका दिया है ख़ुद को वहीं वहीं जिन गलियों के सितारे थे हम वहीं जिनके कि शाहज़ा...

रामानुजन ( नज़्म )

Remembering , Srinivasa Ramanujan Aiyangar; 22 December 1887 – 26 April 1920  अजब दीवानगी थी अजब इंसान था वो गणित के पेड़ का इक  अजब लोबान था वो ज़रा सी उम्र को बस वो लासा था रवाँ पर ज़रा सी उम्र को ही जहाँ में था अयाँ पर जो ख़ुशबू फ़ैली उसकी तो यूँ आसार आयें कि मुद्दत को रवाँ था कि मुद्दत को अयाँ था अलग क़तरे का था वो अजब शय से बना था महकता जा रहा था महकता जा रहा है अलग रंगत थी उसकी अजब कर के गया है फ़क़त बत्तिस तहों को हज़ारों तह किया है फ़ज़ाएँ कह रही हैं हवाएँ कह रही हैं महकता जा रहा था महकता जाएगा वो अजब दीवानगी थी अजब इंसान था वो गणित के पेड़ का इक  अजब लोबान था वो — नज़र लोबान - Used for making Incense and perfumes लासा - Gum like part of tree from which loban is obtained रवाँ - Active अयाँ - Visible क़तरे - Droplets शय - Thing

इश्क़ (नज़्म )

#नज़्म न तुमसे कुछ शिकायतें न तुमसे कुछ उमीद-ए-नाज़ न हसरतें हैं तुमसे कुछ न तुमसे आरज़ू-ए-इश्क़ मगर जो बात है कि हो नफ़स-नफ़स में तुम निहाँ लहू-जिगर में तुम रवाँ तुम्हीं ख़िज़ाँ ,तुम्हीं बहार तुम्हीं सुकूँ , तुम्हीं ख़ुमार जलूँ तो गोया शमअ तुम बुझूँ तो तुम धुआँ-ओ-राख़ 'नज़र' हूँ गर परिन्द मैं तुम आसमाँ तुम्हीं क़फ़स मैं तुमसे छूट के भी हूँ तुम्हीं में बस क़फ़स-क़फ़स तुम्हीं में बस नफ़स-नफ़स मगर ये इश्क़ है मेरा ये है मेरा मुआमला तो तुमसे कैसी आस फिर तो तुमसे फिर उमीद क्यूँ न चाहो तुम तो क्या हुआ न देखो तुम तो क्या हुआ मैं इतना जानता हूँ बस मैं जी रहा हूँ तुमसे ही मैं तुमसे हूँ वजूद में पतंग मैं , हवा हो तुम शराब मैं , नशा हो तुम क़िताब मैं , ज़हीन तुम बहार मैं , हसीन तुम मक़ाम मैं, हो ज़र्फ तुम मैं लफ़्ज़ हूँ तो हर्फ़ तुम मगर किसी भी तौर से कोई भी हक़ नहीं मेरा कि तुमपे हक़ जताऊँ मैं मैं जी रहा हूँ तुमसे तो भला ये क्यूँ ज़रूरी हो कि तुम भी मुझसे ही जियो कि तुम भी मुझमें ही बसो हर एक फ़र्द को है हक़ कि जिसको चाहे , चाहे वो कि जिससे चाहे कर ले इश्क़ ख़ुदा हो या हो कोई शख़...

पल (नज़्म)

इस पल में है सब कुछ जाने-जहाँ हम भी हैं यहीं तुम भी हो यहाँ आँखों में तुम्हारे आँख हैं और हाथों में तुम्हारे हाथ तपाँ  अब इससे ज़ियादा क्या चाहें ढ़लने न सके ये रुत ये समाँ वो बारिश क्या वो क्या सावन जिसमें न तुम्हारे नक़्श-अयाँ वो क्या शबनम वो फूल ही क्या  जिसपर न तुम्हारे लम्स हो जाँ  वो क्या जन्नत वो कैसी बहार  जब तुम न रवाँ जब तुम न वहाँ इस पल में है सब कुछ जाने-जहाँ हम भी हैं यहीं तुम भी हो यहाँ वो हुस्न ही क्या वो कैसी हूर गर सिर से पाँव वो तुम सी नहीं वो क्या मरहम वो कैसी दवा जब चश्म-ए-सुकूँ को तुम ही नहीं वो क्या दरवाज़ा कैसी सुराख़ जब मिल ही न पाएँ दोनों मकाँ ऐ काश कि ऐसा हो पाए  हम सुनते रहें तुम्हें शीरीं-ज़ुबाँ ऐ काश की ऐसा हो पाता तुम सोचते ही हो जाती अयाँ इस पल में है सब कुछ जाने-जहाँ हम भी हैं यहीं तुम भी हो यहाँ वो कैसे ख़िज़ाँ वो कैसे फ़क़ीर जिस पर हो तुम्हारे रंग-ओ-निशाँ वो क्यूँ सहरा वो क्यूँ बंजर जिसपर हो तुमहारे अक्स-फ़शाँ इस वक़्त है हम पर रब माइल इस वक़्त है हमको ख़ुद पे गुमाँ इस पल में है सब कुछ जाने-जहाँ हम भी हैं यहीं तुम भी हो यहाँ इतनी सी तमन्ना है...

हिन्दी ( नज़्म/कविता )

अंग्रेजी के पाँव तले ख़ुद ही के घर में रहना इतना भी आसान नहीं भारत में हिन्दी होना शान के टीके से ढल-ढल कर,दाग़ शर्म का कहलाना इतना भी आसान नहीं भारत में हिन्दी होना रैप,गालियों, देश-द्रोह में,बे-आवाज़ ही घुल जाना इतना भी आसान नहीं भारत में हिन्दी होना ― नज़र  

परी ( नज़्म )

जानाँ तुम ऐन उसी परी सी हो चाँद पर बैठ कर जो आती थी जो मुझे ख़ाब में बचाती थी दश्त में रास्ता दिखाती थी भटकूँ तो सामने आ जाती थी ख़ुशी के बस्ती में ले जाती थी हँसी के पेड़ों से मिलाती थी समा का सैर फिर कराती थी बादलों पर मुझे ले जाती थी तीरगी से मुझे उठा कर के रौशनी पर मुझे बिठाती थी रात में नींद गर न आये मुझे आके वो लोरियाँ सुनाती थी मुझसे हर ग़म निकाल जाती थी मेरी सब ख्वाहिशें समझती थी बिन कहे सच बना के देती थी कोई वहशत मुझे सताए तो उसका वो ख़ून सा पी जाती थी कोई अपना मुझे रुलाये तो आके वो आँसू पोछ जाती थी बिन कहे दर्द जान लेती थी जादू सा फिर कोई चलाती थी रो रहे दिल को फिर वो मेरे'नज़र' गोया इक झटके में हँसाती थी पुर-कशिश उस सी कोई भी नहीं थी हमनवा उस सी कोई बन न सकी ख़ैर ये सब तो इक फ़साना था हाँ मगर तुम मेरी हक़ीक़त हो और तुमसे फ़क़त ये कहना है "जानाँ तुम ऐन उसी परी सी हो"  ― नज़र ऐन - Exactly दश्त - Forest समा - heaven,sky तीरगी - Darkness हमनवा - Friend, Companion 

तुम्हारे आगे (नज़्म)

आज इस उफ़क़ से सारी रंग-ए-शफ़क़ चुरा के पुर-नूर चाँदनी से नूर-ओ-चमक चुरा के बरसात-ओ-गुल से भीनी-भीनी महक चुरा के पाकीज़गी की पहली-पहली झलक चुरा के हूर-ए-अदन की नक़्श-ए-नाज़-ओ-दमक चुरा के जो कुछ बना रहा हूँ ,जो कुछ बना चुका हूँ फ़ीकी सी लग रही है मुझको तुम्हारे आगे । آج اس اُفق سے ساری رنگِ شفق چرا کے پر نور چاندنی سے نوروچمک چرا کے برسات و گل سے بھینی بھینی مہک چرا کے پاکیزگی کی پہلی پہلی جھلک چرا کے ہوتے ادب کی نقشے نازو دمک چرا کے جو کچھ بنا رہا ہوں ، جو کچھ بنا چکا ہوں فیقی سی لگ رہیں ہے مجھکو تمہارے آگے — नज़र نظر उफ़क़ - Horizon रंग-ए-शफ़क़ - Colour of evening twilight हूर-ए-अदन - Angel of Paradise नक़्श-ए-नाज़-ओ-दमक - imprint of beauty and charm

पासबाँ (नज़्म)

सुनो ऐ पासबाँ देखो ,हमारे घर में कोई सानेहा या फिर कोई अग़्यार किस भी तौर से दाख़िल न होने पाए , अगर जो हो रहें हैं तो सभी इलज़ाम तेरे सर सभी तनक़ीद तेरे सर । मगर हाँ , देख लो तुम हम मकीं से कुछ वज़ाहत ले नहीं सकते, कोई तहक़ीक़ या तफ़्तीश भी तुम कर नहीं सकते । ― नज़र पासबाँ - Watchman ; सानेहा - दुर्घटना,Accident, disaster ; अग़्यार - Strangers ; तनक़ीद - Criticism ;वज़ाहत - Clarification #नज़्म #एक_ख़याल #NRC 

Rape In India (Nazm)

कुछ इक शम्मे जलेंगे और कुछ दिन लोग चीखेंगे , कुछ इक अख़बार जागेंगे , कुछ इक आँसू भी छलकेंगे , कुछ इक तो धर्म की पट्टी से आँखों को ही ढ़क लेंगे , तो कुछ बंदिश लगा देंगे परिन्दों की उड़ानों पे , कोई पिंजरे में रख देगा तो कोई बांध देंगे पंख , कुछ इक पल आसमाँ पे पहरे-दारी भी बढ़ा देंगे , मगर जो आलम-ए-कल था वो ही फिर कल का भी होगा ! न हम हैं शाह , न मसनद पे ,न ही है आसमाँ पे ज़ोर , जो कोई आसमाँ के इन परिन्दों को कभी नोचे , कभी काटे ,कभी कुचले कभी बे-जान कर छोड़े , तो हम ये हुक्म दे दें या कोई कानून ही कर दें , सलाख़ों के बजाए सब के सब के सर क़लम कर दो ! मगर हम जानते हैं कुछ भी ऐसा हो नहीं सकता , वो सब जो आलम-ए-कल था वो ही फिर कल का भी होगा । ― नज़र نذر शम्मा - Flame शाह - King मसनद - Seat of Honour

वो लड़की ( नज़्म )

~ वो लड़की ( नज़्म ) ~ अलग रात थी वो ,अलग थी वो लड़की अलग तौर से ही मैं उससे मिला था अजब वक़्त-ओ-लहज़े में मुझसे मिली थी अजब आश्नाई थी बातों में उसके अलग ही कशिश उसने पहना था मानो मैं उसकी तरफ़ जैसे खिंचने लगा था परी सी कोई जादूगरनी हो जैसे अजब लर्ज़िशें दिल में होने लगी थी यूँ मानो कि दस्तक दिया हो किसी ने मैं उसमें नहीं था , वो मुझमें नहीं थी मगर कुछ हमें खींचती जा रही थी ख़ुदा की थी नेमत या कोई तसव्वुफ़ कोई उन्स या आसमानी तअल्लुक या कोई तिलिस्मी हसीं रब्त थी वो या सालिम मोहब्बत के एहसास थें वो न जाने वो क्या चीज़ थी दरमियाँ में मगर जो भी थी वो बहोत ही अलग थी उसी की तरह मुनफ़रिद थें वो एहसास जहाँ भर से बिल्कुल अलग थी वो लड़की वो यकता सी लड़की मेरे पास है अब है तामीर ऐसी कि जैसे परी हो मेरे ख़्वाब जैसी है बिल्कुल वो लड़की बहोत अलाहिदा है , अजब पुरकशिश है 'नज़र' मुख़्तलिफ़ है हर इक बात उसकी कभी मेरी माँ सी मुझे डांटती है कभी एक नादान बच्ची सी लगती कभी शोख़ मस्ती है बातों में उसके कभी बातें बाबा सी संजीदा कहती कभी हीर जैसी वो माशूक़ है तो कभी पेश आती है मीरा के जैसी ...

दर्द-ए-इश्क़ ( नज़्म )

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तुमको इक दिन ये मोहब्बत याद आएगी और फिर बातें मेरी तुमको रुलाएँगी नींद फिर रातों में तुमको भी न आएगी और मेरी चाहतें तुमको सताएँगी लाख आयेंगे मोहब्बत ले के तुम तक पर इश्क़ मेरे जैसा तुमसे कर न पायेंगे कुछ पलों को लब पे तेरे वो सजेंगे पर उम्र भर तेरे लबों पे रह न पायेंगे आज तुमको जो मोहब्बत दर्द लगती है कल तुम्हें अश्कों में वो शब भर हँसाएँँगी तुमको इक दिन ये मोहब्बत याद आएगी और फिर बातें मेरी तुमको रुलाएँगी झूठ के जज़्बात तुमको रास आयेंगे रात दिन तेरे लबों को वो हँसाएँँगे  कुछ पलों को तुम भी उनमें गुम हो जाओगी और फिर यूँ हीं मुझे तुम भूल जाओगी फिर किसी दिन सारे झूठे जज़्ब टूटेंगे  और मलाल ओ ग़म में तेरे अश्क छूटेंगे फिर तुम्हें उस रोज़ बस हम याद आयेंगे  तब तलक हम दूर पीछे छूट जायेंगे हर पहर हर पल फ़क़त तुम मुझको ढूँढोगी पर मोहब्बत लौट कर वापस न आएगी तुमपे लिक्खी फिर मेरी ग़ज़लें पढ़ोगी तुम फिर वो ही ग़ज़लें मेरी चाहत बताएँगी तुमको इक दिन ये मोहब्बत याद आएगी और फिर बातें मेरी तुमको रुलाएँगी छूट कर तुमसे मैं ख़ुद भ...

इश्क़ ( नज़्म )

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~इश्क़ (नज़्म)~ उम्र भर रोते रहेंगे इश्क़ वाले , अश्क में डूबे रहेंगे इश्क़ वाले , हर दुआ में बस उसे माँगा करेंगे , जान भी देना हो गर तो दे भी देंगे , लाख कोशिश से भी लेकिन कुछ न होगा, एक दिन दोनों जुदा होने को होंगे , हँसते रहने के 'नज़र' फिर वादे होंगे , इक दुआ में भी न जिसने माँगा होगा , वो उसी के उम्र भर हो के रहेंगे , नर्म दिल उनमें से शायद मर भी जायें , संग दिल पर तीसरे में गुम रहेगी , हश्र तो अक्सर यूँ ही होता रहा है , इश्क़ वालों के गले ही सूखते हैं , इश्क़ वाले प्यासे मरते आ रहे हैं , इश्क़ वाले प्यासे ही मरते रहेंगे । ― नज़र संग दिल - Hard Hearted

सी गयी

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मेरी ये आँख तुझे छू के गुज़र सी गयी,   मगर हाँ दिल पे मेरी जाँ तू ठहर सी गयी  , शब ओ सहर मुझे फिर बहोत सताया तूने , मगर तू घुल के जिस्मोजाँ में बिखर सी गयी ।  बुझा बुझा था फ़लक पे मैं अंधेरो की तरह , तुम्ही ने आके सजाया फिर सितारों की तरह , तमाम रंग जो गवाए ज़िन्दगी की ख़िज़ाँ में तुम्ही ने आके लौटाया फिर बहारों की तरह , छुआ जो तुमने मेरी हालत सँवर सी गयी , गले से यूँ लगाया कि आँख भर सी गयी , तुम्ही को पाके मैने ख़ुद को भी पाया सनम , दिये की लौ सी जैसे मुझमे उतर सी गयी । मेरी ये आँख तुझे छू के गुज़र सी गयी,   मगर हाँ दिल पे मेरी जाँ तू ठहर सी गयी । ― नज़र शब ओ सहर - Night and Day फ़लक - Sky ख़िज़ाँ - Autumn , पतझड़ बहार - spring , वसंत

सफ़र ए मोहब्बत

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मोहब्बत गुज़रती है तोहमत से होके , गुज़रती है फिर वो ही रहमत से होके , इनायत से होके ,अक़ीदत से होके , झिझक से भी होके ,हया से भी होके , मोहब्बत मगर है हया से भी आगे , शरारत से होके ,शिकायत के आगे , है जन्नत से होके , वो जिल्लत के आगे , मगर है उतरना यहाँ नागवारा , जो उतरे कोई तो दग़ाबाज़ है वो , मगर ये है आलम ,यहाँ लोग अक्सर , बता के मोहब्बत ,उतरते हैं जन्नत , मगर कुछ दिवानों ने देखी है जिल्लत , बढ़े भी हैं आगे वो वहशत से होके , इबादत से आगे सदाक़त से होके , नदामत से आगे , हाँ , नफ़रत से होके , मलामत से आगे , अज़ीयत से होके , ये पाने ओ खोने की हसरत के आगे , जो बुझने न पाये ,शमा वो जला के , बढ़ोगे अगर तुम मसाफ़त में आगे , गरज़ सब भुला के जो चाहत के आगे , क़ज़ा की रियासत से कुछ मील पहले , दिखेगी तुम्हे फिर जो तख़्ती सुकूूँ की , तुम उतरो न उतरो ,वही है मोहब्बत , मोहब्बत की गाड़ी वहीं पे रुकेगी । — नज़र तोहमत - False Allegation , झूठा आरोप इनायत - Kindness अक़ीदत - Faith , Affection , Attachment हया - shame , शर्म नागवारा - Not acceptable ...

इज़हार (नज़्म)

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चढ़ा है ये मुझपर किसी आश्ना का ख़ुमार ये कैसा , मैं कहना भी चाहूँ पर कह भी ना पाऊँ मगर कह रहा हूँ , तू ही ज़ुस्तज़ू है ,तू ही आरज़ू है , सुकूँ में भी तू ही, जुनूँ में भी तू ही , अक़ीदत तू ही है ,इबादत तू ही है , दिल मे तुम ही हो ,ज़बाँ पे तुम ही हो , राहत भी तुम ही , चाहत भी तुम ही , यादों में तुम ही , बातों में तुम ही , सांसों में तुम ही , ख़्वाबों में तुम ही , दुआ भी तुम ही हो , दवा भी तुम ही हो , हसी भी तुम ही हो , खुशी भी तुम ही हो , छिपाता भी हूँ मैं ,जताता भी हूँ मैं , मगर दिल मे है जो ,बताता नही मैं , मगर आज खुल के दिल ओ जाँ से अपने लो कहता हूँ यारा , तुम हूर ए 'नज़र' हो ऐ जान ए तमन्ना मुझे दिल ओ जाँ से ... मोहब्बत है तुमसे ,मोहब्बत है तुमसे , मोहब्बत है तुमसे । — नज़र आश्ना - One who is devoted to love (Female) अक़ीदत - Faith हूर ए 'नज़र' - Nazar's Angel *Completely Fictious

नया साल

फ़ज़ाओं ने अपनी मिज़ाजें बदल लीं ? सलीक़ा हवाओं ने बहने का बदला ? रवैया अंधेरों ने आने का बदला ? या तब्दीलियाँ आ गईं हैं सहर में ? क़मर ने ज़मी को इशारे दिए कुछ ? सितारे ज़ियादा चमकने लगें क्या ? धनक ने निकलकर बताया नया कुछ ? या सूरज के रंगत में आया फ़रक कुछ ? न बदली फ़ज़ा ये न बदला ये मौसम , हाँ ,बदला है कुछ तो ये धरती का आलम , बदलने की फिर ख़ुद को ठाना है सबने, नए साल के फिर नए इस भरम में , हाँ ,तारीख़ों ने पैरहन अपने बदलें , अँधेरे नशे में भी हैं कुछ ज़ियादा , ज़रा सी हवाएँ भी ज़ख़्मी हुई है , तो कसमे ओ वादे भी मसरूफ़ होंगे , मगर ये जो हैं सब महज़ हैं सियापे , हम इंसान तारीख़ों के कब थें मोहताज़, बदलना है गर तो अभी ख़ुद को बदलो , मगर ये 'अभी' ज़ेहन में है हमारे । ― नज़र सहर - Morning क़मर - Moon धनक - Rainbow पैरहन - Dress मसरूफ़ - Busy #NewYear2019