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इतिहास (ग़ज़ल)

एक बहुत पहले लिखी क़िता-बंद ग़ज़ल ... एक क़िता-बंद ग़ज़ल में कुछ ख़याल एक से ज़ियादा अशआर Series में कह कर कहे जाते हैं , जिसे दरअसल क़िता भी कहते हैं , और एक ग़ज़ल जिसमें एक या एक से ज़ियादा क़िता हों , उसे क़िता-बंद ग़ज़ल कहते हैं । #ghazal 'नज़र' कुछ ख़ास कहना है तभी तो दिल भी  सहमा है نظر کچھ خاص کہنا ہی تبھی تو دل بھی صحما ہے ज़ुबाँ  से  कह नहीं  सकता मुझे   आँखों  से   कहना  है زباں سے کہ نہیں سکتا مجھے آنکھوں سے کہنا ہے न कोई  लफ्ज़-ए-लब मैंने तुम्हें   ख़ामोश    सुनना  है ن کوئی لفز_لب میںنے تمہیں خاموش سننا ہے मोहब्बत  आग  है  गर  तो मुझे   शोलों  सा  बनना  है محبّت آگ ہے گر تو مجھے شعلوں سا بننا ہے मुझे  ना   इश्क़   करना  है न   मुझको  दर्द   सहना  है مجھے نا عشق کرنا ہے ن مجھکو درد سہنا ہی मेरी   तामीर   बुज़दिल  है मुझे  बस  ख़ुद में  रहना  है ...

इतिहास (ग़ज़ल)

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'नज़र' कुछ ख़ास कहना है , तभी तो दिल भी  सहमा है । ज़ुबाँ  से  कह नहीं  सकता , मुझे   आँखों  से   कहना  है । कोई   अल्फाज़  नहीं   मैंने , तुम्हें   ख़ामोश    सुनना  है । मोहब्बत  आग  है  गर  तो , मुझे   शोलों  सा  बनना  है । मुझे  ना   इश्क़   करना  है , न   मुझको  दर्द   सहना  है । मेरी   तामीर   बुजदिल   है , मुझे  बस  ख़ुद में  रहना  है । तुम्हारे       रंग       देखूँगा , सो मुझको मर के बचना है । तेरे   दिल  में  तो  सूखा  है , मगर  आँखों   में  क़तरा  है । निगाहों    में   यक़ीनन   ही , तिरे   कुछ  राज़   गहरा  है । गुलिस्ताँ   रश्क  खाता  ...