इतिहास (ग़ज़ल)

'नज़र' कुछ ख़ास कहना है ,
तभी तो दिल भी  सहमा है ।

ज़ुबाँ  से  कह नहीं  सकता ,
मुझे   आँखों  से   कहना  है ।

कोई   अल्फाज़  नहीं   मैंने ,
तुम्हें   ख़ामोश    सुनना  है ।

मोहब्बत  आग  है  गर  तो ,
मुझे   शोलों  सा  बनना  है ।

मुझे  ना   इश्क़   करना  है ,
न   मुझको  दर्द   सहना  है ।

मेरी   तामीर   बुजदिल   है ,
मुझे  बस  ख़ुद में  रहना  है ।

तुम्हारे       रंग       देखूँगा ,
सो मुझको मर के बचना है ।

तेरे   दिल  में  तो  सूखा  है ,
मगर  आँखों   में  क़तरा  है ।

निगाहों    में   यक़ीनन   ही ,
तिरे   कुछ  राज़   गहरा  है ।

गुलिस्ताँ   रश्क  खाता   है ,
अजब   ख़ुदरंग   सहरा  है ।

मेरी  तबियत तो  बंजर  है ,
मगर   शादाब    चेहरा   है ।

कदूरत   छोड़  कर   आना ,
जिगर  पे   सख़्त  पहरा  है ।

परों   को  खोल  कर  देखो ,
क़फ़स  ने   सम्त  बदला  है ।

गया कुछ भी नहीं अब तक ,
ज़रा  सा  शाम   निकला  है ।

सितारे  हो  फ़लक  के  तुम ,
तुम्हे  तो शब में  खिलना है ।

बदलना है  मुझे  सब  कुछ ,
नया सा  मुझको  दिखना है ।

ज़मी   संग  आसमाँ   रो  दे ,
मुझे   कुछ    ऐसे   मरना  है ।

फ़क़त  बुझना नहीं जल के ,
मुझे   इतिहास   लिखना  है ।

― नज़र

तामीर - Construction
क़तरा - Drop
गुलिस्ताँ - Garden
रश्क - Envy
सहरा - Desert
शादाब - Verdant , हरा-भरा
कदूरत - मैल , ill will
क़फ़स - Cage
सम्त - Direction
फ़लक - Sky
शब - Night
फ़क़त - Only






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