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नहीं (ग़ज़ल)

तू उसे इसलिए बस भूला नहीं दूसरा कोई मयस्सर था नहीं تو اُسے اسلئے بس بھولا نھیں دوسرا کوئی میسّر تھا نہیں जाने क्या नाम था उस शहर का दोस्त सिवा इक शक्ल के कुछ देखा नहीं جانے کیا نام تھا اُس شہر کا دوست سوا اک شکل کے کچھ دیکھا نہیں कुछ अजब लोग बता के सभी को कहते हैं फिर किसी से कहना नहीं کچھ عجب لوگ بتا کے سبھی کو کہتے ہیں پھر کسی سے کہنا نہیں उसमें ज़िन्दा है मुसलसल तो क्या वास्ते तेरे वो गर ज़िन्दा नहीं اُسمیں زندہ ہے مسلسل تو کیا واسطے تیرے وہ گر زندہ نہیں चर्चा-ए-शहर था बेटे का अमल रस्म-ए-गिर्या में भी वो रोया नहीं چرچاِ شہر تھا بیٹے کا عمل رسمِ گِرْیہ میں بھی وہ رویا نہیں उससे बढ़कर नहीं नफ़रत किसी से उससे बढ़कर कभी कोई था नहीं اُسّے بڑھکر نہیں نفرت کسی سے اُسّے بڑھکر کبھی کوئی تھا نہیں चाँद हासिल किया है जुगनू फिर कौन कहता है मेरे बस का नहीं چاند حاصل کیا ہے جُگنو پھر کوں کہتا ہے مِرے بس کا نہیں मौत बस एक बहाना है 'नज़र' लोग मिट जाते हैं या तो या नहीं موت بس ایک بہانہ ہے 'نظر' لوگ مٹ جاتے ہیں یا تو یا نہیں — नज़र نظر मयस्सर - Available मुसलसल - Continuously अमल - Act गिर्...

नहीं ( ग़ज़ल )

बग़ैर उनके आज तक कोई महल बना नहीं वो दफ़्न आह-ओ-दर्द जो किसी तलक गया नहीं بغیر اُنکے آج تک کوئی محل بنا نہیں وہ دفن آہ و درد جو کسی تلک گیا نہیں गिला नहीं मगर कई दफ़ा ये बात चुभती है मेरे मिज़ाज का कोई भी दोस्त मिल सका नहीं گلہ نہیں مگر کئی دفعہ یہ بات چبھتی ہے میرے مزاج کا کوئی بھی دوست مل سکا نہیں सितारे हो तो क्या हुआ ,क़तार में खड़े रहो अभी शफ़क़ का वक़्त है कि दिन अभी ढ़ला नहीं ستارے ہو تو کیا ہوا ، قطار میں کھڑے رہو ابھی شفق کا وقت ہے کہ دن ابھی ڈھلا نہیں रुको तमाम वहशतों कि अब भी बाक़ी है उमीद कि आस्था का दीप एक अभी तलक बुझा नहीं روکو تمام وحشتوں کہ اب بھی باقی ہے امید کہ آستھا کا دیپ ایک ابھی تلک بجھا نہیں न जाने तुमसे इश्क़ है ,लगाव है या जाने क्या प' तुमसे दूर होने का कभी भी डर लगा नहीं ن جانے تمسے عشق ہے ، لگاؤ ہے یا جانے کیا پ تمسے دور ہونے کا کبھی بھی ڈر لگا نہیں नए-नए क़दम का लड़खड़ाना भी ज़रूरी है समझने को जहाँ में कोई सीधे दौड़ता नहीं  نئے نئے قدم کا لڑکھڑانا بھی ضروری ہے سمجھنے کو جہاں میں کوئی سیدھے دوڑتا نہیں हज़ार-हा गिले हैं तुमसे और कहा भी है ख़मोश ये और बात हो गई कि तुमने कुछ स...

नहीं आया ( ग़ज़ल )

 मुझे कभी भी कोई भी हुनर नहीं आया सुख़न का शौक़ था बे-शक़ मगर नहीं आया مجھے کبھی بھی کوئی بھی ہنر نہیں آیا سخن کا شوق تھا بے شق مگر نہیں آیا न जाने कौन सी वहशत थी सब तड़प रहे थें मगर कोई भी उधर से इधर नहीं आया ن جانے کون سے وحشت تھی سب تڑپ رہے تھیں مگر کوئی بھی اُدھر سے ادھر نہیں آیا जतन से बोए थें कुछ एक बीज रौशनी के नसीब देखो किसी से शजर नहीं आया جتن سے بوئے تھیں کچھ ایک بیج روشنی کے نصیب دیکھو کسی سے شجر نہیں آیا  ये रश्क था या कि आब-ए-जबीं को देख उसकी  न जाने क्या हुआ जो दोपहर नहीं आया یہ رشک تھا یا کِ آب_جبیں کو دیکھ اسکی  ن جانے کیا ہوا جو دوپہر نہیں آیا जलाना चाहा था मैंने तमाम शहर-ए-याद कोई भी शोला मगर उस क़दर नहीं आया جلانا چاہا تھا میںنے تمام شہر_یاد کوئی بھی شولا مگر اس قدر نہیں آیا लुभाया ऐसा कि कोई भी झाँसे में आये वफ़ा भी ऐसी कि कोई नज़र नहीं आया لبھایا ایسا کِ کوئی بھیم جھانسے میں آئے وفا بھی ایسی کِ کوئی نظر نہیں آیا  निजात मर्ज़ से पा लूँगा उसके आते ही ये यक़ीं दिला के मुझे चारा-गर नहीं आया نجات مرض سے پا لونگا اسکے آتے ہی یہ یقیں دلا کے مجھے چراگر نہیں ...