नहीं आया ( ग़ज़ल )
मुझे कभी भी कोई भी हुनर नहीं आया
सुख़न का शौक़ था बे-शक़ मगर नहीं आया
مجھے کبھی بھی کوئی بھی ہنر نہیں آیا
سخن کا شوق تھا بے شق مگر نہیں آیا
न जाने कौन सी वहशत थी सब तड़प रहे थें
मगर कोई भी उधर से इधर नहीं आया
ن جانے کون سے وحشت تھی سب تڑپ رہے تھیں
مگر کوئی بھی اُدھر سے ادھر نہیں آیا
जतन से बोए थें कुछ एक बीज रौशनी के
नसीब देखो किसी से शजर नहीं आया
جتن سے بوئے تھیں کچھ ایک بیج روشنی کے
نصیب دیکھو کسی سے شجر نہیں آیا
ये रश्क था या कि आब-ए-जबीं को देख उसकी
न जाने क्या हुआ जो दोपहर नहीं आया
یہ رشک تھا یا کِ آب_جبیں کو دیکھ اسکی
ن جانے کیا ہوا جو دوپہر نہیں آیا
जलाना चाहा था मैंने तमाम शहर-ए-याद
कोई भी शोला मगर उस क़दर नहीं आया
جلانا چاہا تھا میںنے تمام شہر_یاد
کوئی بھی شولا مگر اس قدر نہیں آیا
लुभाया ऐसा कि कोई भी झाँसे में आये
वफ़ा भी ऐसी कि कोई नज़र नहीं आया
لبھایا ایسا کِ کوئی بھیم جھانسے میں آئے
وفا بھی ایسی کِ کوئی نظر نہیں آیا
निजात मर्ज़ से पा लूँगा उसके आते ही ये
यक़ीं दिला के मुझे चारा-गर नहीं आया
نجات مرض سے پا لونگا اسکے آتے ہی یہ
یقیں دلا کے مجھے چراگر نہیں آیا
यही था बख़्त मेरा सिक्का जो उछाला तो
वो बारहा चुना मैंने जिधर नहीं आया
یہی تھا بخت میرا سکّہ جو اچھالا تو
وہ بارہا چنا میںنے جدھر نہیں آیا
'नज़र' जो साया था मेरा गए दिनों में वही
गया कुछ ऐसे कि फिर उम्र-भर नहीं आया
'نظر' جو سایہ تھا میرا گئے دنوں میں وہی
گیا کچھ ایسے کِ پھر عُمر بھر نہیں آیا
— नज़र نظر
सुख़न - Poetry
वहशत - Fear
शजर - Plant , Tree
रश्क - Envy
आब-ए-जबीं - Lustre of Forehead , माथे की चमक
शोला - Flame
निजात - Liberation
मर्ज़ - Disease
चारा-गर - Doctor
बख़्त - Destiny
बारहा - Again and Again
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