तारीफ़ों का भूखा (ग़ज़ल)

छिपाये    बताये   ग़लत   भी   कहाँ   है ,
तारीफ़ों  का भूखा  हर  शख़्स  यहाँ  है ।

जो  क़ब्रें  खुलीं  तो  तूफ़ानें   दफ़न  थी ,
पता   तब  लगा   कि  ये   हिंदुसिताँ  है ।

चराग़ें   वो   शबनम  से   गीले  पड़े  हैं ,
सवर्णों  की  भी  कुछ  यही  दास्ताँ   है ।

कोई  रौशनी  है   ना  जलती  शमा  है ,
बहोत   बेबसी   में    मेरा   आस्ताँ   है ।

शिकायत  हवाओं से  करता तो  हूँ  मैं ,
मगर  मेरे  लहरों  में  दम  भी  कहाँ  है ।

फ़रक  ना  करे  जो  गुलों   में  ज़रा  भी ,
गुलिस्ताँ  का  असली  वही  बाग़बाँ  है ।

क्या शीशा मैं देखूँ क्या ख़ुद को संवारूँ ,
मेरा    इम्तिहाँ    है    अँधेरा   जहाँ   है ।

'नज़र' इस  ज़माने में  इतना समझ लो ,
दौलत   जहाँ    है    ख़िदमत   वहाँ   है ।

― नज़र

शबनम - Dew
शमा - Flame , Light
बेबसी - Helplessness
आस्ताँ - Treshhold ,दहलीज़
गुलों - Flowers
गुलिस्ताँ - Garden of Flowers
बागबाँ - Gardner










Comments