सी गयी

मेरी ये आँख तुझे छू के गुज़र सी गयी,  
मगर हाँ दिल पे मेरी जाँ तू ठहर सी गयी  ,
शब ओ सहर मुझे फिर बहोत सताया तूने ,
मगर तू घुल के जिस्मोजाँ में बिखर सी गयी । 

बुझा बुझा था फ़लक पे मैं अंधेरो की तरह ,
तुम्ही ने आके सजाया फिर सितारों की तरह ,
तमाम रंग जो गवाए ज़िन्दगी की ख़िज़ाँ में
तुम्ही ने आके लौटाया फिर बहारों की तरह ,

छुआ जो तुमने मेरी हालत सँवर सी गयी ,
गले से यूँ लगाया कि आँख भर सी गयी ,
तुम्ही को पाके मैने ख़ुद को भी पाया सनम ,
दिये की लौ सी जैसे मुझमे उतर सी गयी ।

मेरी ये आँख तुझे छू के गुज़र सी गयी,  
मगर हाँ दिल पे मेरी जाँ तू ठहर सी गयी ।

― नज़र

शब ओ सहर - Night and Day
फ़लक - Sky
ख़िज़ाँ - Autumn , पतझड़
बहार - spring , वसंत


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