तो कैसे ( ग़ज़ल )
ये दिल चीर के मैं दिखाऊँ तो कैसे ,
तुझे धड़कनों में सुनाऊँ तो कैसे ।
मैं सज्दे में तुझको ही पढ़ता हूँ फिर भी ,
मोहब्बत है तुमसे जताऊँ तो कैसे ।
मोहब्बत मेरी कटघरे में खड़ी है ,
उसे बे-गुनाह मैं बताऊँ तो कैसे ।
लहू में मेरे दौड़ती है वो ही पर ,
यक़ी ये उसे मैं दिलाऊँ तो कैसे ।
इन आँखों में बस तुझको लिक्खा है मैंने ,
ये आँखें मगर मैं पढ़ाऊँ तो कैसे ।
सभी चाँद , तारे गवाहें हैं मेरी ,
उन्हें पर ज़मीं पे मैं लाऊँ तो कैसे ।
बे-बाकी का हथियार लेके मैं ज़ाहिद ,
भरोसे में तेरे मैं आऊँ तो कैसे ।
जलाती हो जो आग नफ़रत की मुझसे ,
बताओ सनम मैं बुझाऊँ तो कैसे ।
मेरे हरकतों से वो रोयी है गर तो ,
बताओ मैं ख़ुद को हँसाऊँ तो कैसे ।
चली जो गयी रूठ कर आज फिर तुम ,
कहो मैं ये रातें बिताऊँ तो कैसे ।
न सोचा ज़रा भी मेरी कैफ़ियत का ,
मैं रोया हूँ कितना दिखाऊँ तो कैसे ।
'नज़र' जब मैं दिल से ही ख़ूँ रो रहा हूँ ,
मैं अश्कों से ख़ुद को रुलाऊँ तो कैसे ।
― नज़र
ज़ाहिद - गुनाहों से दूर रहने वाला , Devotee
अश्कों - Tears
कैफ़ियत - Circumstances , हालत
तुझे धड़कनों में सुनाऊँ तो कैसे ।
मैं सज्दे में तुझको ही पढ़ता हूँ फिर भी ,
मोहब्बत है तुमसे जताऊँ तो कैसे ।
मोहब्बत मेरी कटघरे में खड़ी है ,
उसे बे-गुनाह मैं बताऊँ तो कैसे ।
लहू में मेरे दौड़ती है वो ही पर ,
यक़ी ये उसे मैं दिलाऊँ तो कैसे ।
इन आँखों में बस तुझको लिक्खा है मैंने ,
ये आँखें मगर मैं पढ़ाऊँ तो कैसे ।
सभी चाँद , तारे गवाहें हैं मेरी ,
उन्हें पर ज़मीं पे मैं लाऊँ तो कैसे ।
बे-बाकी का हथियार लेके मैं ज़ाहिद ,
भरोसे में तेरे मैं आऊँ तो कैसे ।
जलाती हो जो आग नफ़रत की मुझसे ,
बताओ सनम मैं बुझाऊँ तो कैसे ।
मेरे हरकतों से वो रोयी है गर तो ,
बताओ मैं ख़ुद को हँसाऊँ तो कैसे ।
चली जो गयी रूठ कर आज फिर तुम ,
कहो मैं ये रातें बिताऊँ तो कैसे ।
न सोचा ज़रा भी मेरी कैफ़ियत का ,
मैं रोया हूँ कितना दिखाऊँ तो कैसे ।
'नज़र' जब मैं दिल से ही ख़ूँ रो रहा हूँ ,
मैं अश्कों से ख़ुद को रुलाऊँ तो कैसे ।
― नज़र
ज़ाहिद - गुनाहों से दूर रहने वाला , Devotee
अश्कों - Tears
कैफ़ियत - Circumstances , हालत

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