ग़ालिब की ज़मीन ( Challenge )
ज़ुल्म हर मज़हब पे था जो गिरजे में ,
हम अज़ानें पढ़ गए थे राम के ।
— नज़र
हम अज़ानें पढ़ गए थे राम के ।
— नज़र
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के ।
— मिर्ज़ा ग़ालिब
काफ़िया - आम ; रदीफ़ - के
( बह्र - 2122 2122 212 )
Challenge was : Using same technicalities to write a couplet :
आरज़ू उनकी क़फ़स में क़ैद थी ,
वो परिन्दे थें मगर बस नाम के ।
― नज़र
( क़फ़स - Cage )


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