काटे जा रहा

सोच से अपनी मुकम्मल रात काटे जा रहा
क्या हुआ जो आज फिर ज़ुल्मात काटे जा रहा
फ़िक्र क्या है ,क्या परेशानी ,ख़ुदी अंजान हूँ
ठीक है सब कुछ मगर मैं बात काटे जा रहा

― नज़र

ज़ुल्मात - Darkness



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