ज़ख़्म लाखों थें मगर मैं जी गया
वक़्त की सूई से सबको सी गया
होश में जब मौत आ जाती मेरी
जाम सारे ले के वो साक़ी गया
आब कैसा था वो मेरे ख़ाब में
घोल कर आँखों को उसके पी गया
बे - क़रारी भी मेरी तुझसे ही थी
और क़रारी दे के भी तू ही गया
सर झुका आया वो हर मज़हब के दर
इश्क़ के दरगाह पे जो भी गया
— नज़र
आब - water
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