गया ( ग़ज़ल )

ज़ख़्म  लाखों  थें  मगर  मैं   जी  गया
वक़्त  की   सूई  से  सबको  सी  गया

होश  में   जब   मौत  आ   जाती  मेरी
जाम   सारे   ले   के   वो  साक़ी  गया

आब   कैसा   था   वो   मेरे   ख़ाब  में
घोल कर  आँखों को उसके  पी  गया

बे - क़रारी   भी   मेरी   तुझसे  ही  थी
और  क़रारी  दे   के  भी   तू  ही  गया

सर झुका आया वो हर मज़हब के दर
इश्क़   के   दरगाह  पे  जो   भी   गया

— नज़र

आब - water




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