हाय री उफ़ ( ग़ज़ल )

तेरी वो तिरछी नज़र हाय री उफ़
हर अदा जैसे शरर हाय री उफ़

تیری وہ ترچھی نظر ہای ری اف
ہر عدا جیسے شرر ہای ری اف

यूँ न तू देख मुझे मुड़ मुड़ के
यूँ न बरपा तू कहर हाय री उफ़

یوں ن تو دیکھ مجھے مڑ مڑ کے
یوں ن برپا تو کہر ہای ری اف

यूँ है , वो हूर परी निकली है
लाल है आज क़मर हाय री उफ़

یوں ہے، وہ ہور پری نکلی ہے
لال ہے آج قمر ہای ری اف

या ख़ुदा कैसे तराशा है इसे
ले गई जानो जिगर हाय री उफ़

یا خدا کیسے تراشا ہے اسے
لے گئی جانو جگر ہای ری اف

मुझको मंज़िल न दिखी किस भी सम्त
किस तसव्वुफ़ में सफ़र हाय री उफ़
مجھکو منزل ن دکھی کیس بھی سمت
کیس تصوّف میں سفر ہای ری اف

तेरी आँखें भी न काफ़ी इसको
जाने ये कैसी लहर हाय री उफ़

تیری آنکھیں بھی ن کافی اسکو
جانے یہ کیسی کہر ہای ری اف

उसने कल से रखी है बे-रिदा शक्ल
कल से है शब में सहर हाय री उफ़

اسنے کل سے رکھی ہے بے- ردا شکل
کل سے ہے شب میں سحر ہای ری اف

आज पहली दफ़ा है क़ैद 'नज़र'
उसकी आँखों का असर हाय री उफ़

آج پہلی دفعہ ہے قید ' نذر '
اسکی آنکھوں کا عصر ہای ری اف

― नज़र نذر

शरर - Spark , चिंगारी
क़मर - Moon
सम्त - Direction
तसव्वुफ़ - Mysticism , रहस्यवाद
रिदा - Veil
शब - Night
सहर - Morning

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