में भी नहीं (ग़ज़ल)

मैं उसको चाह के अपने मकान में भी नहीं
न ख़ुद में रह सका उसके जहान में भी नहीं
میں اسکو چاہ کے اپنے مکان میں بھی نہیں
ن خد میں رہ سکا اسکے جہاں میں بھی نہیں

कहानी के सभी उनवान से तो मिट चुका था
वो मिटते-मिटते अब उस दास्तान में भी नहीं
کہانی کے سبھی عنوان سے تو مٹ چکا تھا
وو مٹتے مٹتے اب اس داستاں میں بھی نہیں

अजीब शख़्स था वो उड़ना भी सिखा के गया
क़फ़स में क़ैद कर अब दरमियान में भी नहीं
عجیب شخص تھا وو اڑنا بھی سکھا کے گیا
قفس میں قید کر اب درمیان میں بھی نہیں

हमारे धड़कनों की तर्जुमानी जो सदा थी
हमारे दिल में नहीं , तर्जुमान में भी नहीं
ہمارے دھڑکنوں کی ترجمانی جو صدا تھی
ہمارے دل میں نہیں ، ترجمان میں بھی نہیں

वो मेरे माज़ी के नाम और रुतबे से डरा है
वगरना तीर तो मेरे कमान में भी नहीं
وو میرے ماضی کے نام آور رتبے سے ڈرا ہے
وگرنہ تیر تو میرے کمان میں بھی نہیں

किसी दुकान-ओ-मतब में नहीं शिफ़ा मौला
तुम्हारे नाम पे चलते दुकान में भी नहीं
کسی دکان_و_مطب میں نہیں شفا مولا
تمہارے نام پے چلتے دکان میں بھی نہیں

जो कल को शबनमी राहत सी आँखों को थी वो अब
खटकती है यूँ कि लफ़्ज़-ए-बयान में भी नहीं
جو کل کو شبنمی راحت سے آنکھوں کو تھی وو اب
کھٹکتی ہے تو کِ لفظ_بیان میں بھی نہیں

क़मर के जाल में ऐसे फँसा हूँ अबकी 'नज़र'
ज़मी पे भी नहीं और आसमान में भी नहीं
'قمر کے جال میں ایسے پھنسا ہوں ابکی 'نظر
زمیں پے نہیں اور آسمان میں بھی نہیں

― नज़र نذر

उनवान - Title
क़फ़स - Cage
तर्जुमानी - Interpretation
सदा - Voice, आवाज़
तर्जुमान - Interpreter
माज़ी - Past
मतब - Clinic,Hospital
शिफ़ा - Cure, Healing
शबनम - Dew
क़मर - Moon

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