रहा हूँ (ग़ज़ल)

रफ़्ता-रफ़्ता मैं ख़ुद से खो रहा हूँ
रफ़्ता-रफ़्ता मैं तुम सा हो रहा हूँ
رفتا رفتا میں خد سے کھو رہا ہوں
رفتا رفتا میں تم سا ہو رہا ہوں

ढूँढता हूँ शब-ओ-सहर उसको
कल तलक बे-क़फ़स मैं जो रहा हूँ
ڈھونڈتا ہوں شب_و_سحر اسکو
کل تلک بے قفس میں جو رہا ہوں

मुझे अब इल्म भी नहीं होता
जाग उट्ठा हूँ या कि सो रहा हूँ
مجھے اب علم بھی نہیں ہوتا
جاگ اٹھّا ہوں یا کِ سو رہا ہوں

ख़ाहिश-ए-दिल से बे-ख़बर हूँ पर
जाने क्यूँ बारहा मैं रो रहा हूँ
خاهشِ دل سے بے خبر ہوں پر
جانے کیوں بارہا میں تو رہا ہوں

रतजगा हो के नींद इक्ट्ठा कर
ख़ाब की मोतियाँ पिरो रहा हूँ
رتجگا ہو کے نیند اکٹٹھا کر
خان کی موتیاں پرو رہا ہوں

शहर-ए-ज़ुल्मत में सब को बतला दो
चुपके-चुपके मैं नूर बो रहा हूँ
شہرِظلمت میں سب کو بتلا دو
چپکے چپکے میں نور بو رہا ہوں

आज मैं हो गया हूँ ख़ाक मगर
कल तेरे दिल में था जो वो रहा हूँ
آج میں ہو گیا ہوں خاک مگر
کل تیرے دل میں تھا جو وہ رہا ہوں

अर्श तक जो 'नज़र' चमकना था
मैं उसी नाम को डुबो रहा हूँ
عرش تک جو 'نظر' چمکنا تھا
میں اسی نام کو ڈبو رہا ہوں

— नज़र نظر

रफ़्ता-रफ़्ता - Slowly , gradually
शब-ओ-सहर - Night and morning
क़फ़स - Cage , पिंजरा
बारहा - Again and again
शहर-ए-ज़ुल्मत - City of darkness , city where Darkness is prevailed
नूर - Light , रौशनी
अर्श - Sky

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