बचपना (ग़ज़ल)
मैं सोचूँ भी तो क्या इस मरहले से
शिफ़ा पाऊँ तो फिर किस रास्ते से
میں سوچوں بھی تو کیا اس مرحلے سے
شفاء پاؤں تو پھر کس راستے سے
भला मैं कैसे संजीदा हो जाऊँ
उसे उल्फ़त है मेरे बचपने से
بھلا میں کیسے سنجیدہ ہو جاؤں
اُسے اُلفت ہے میرے بچپنے سے
मैं राज़ी हूँ जो फिर तुम चाहती हो
मैं लुट जाऊँगा पर इस सिलसिले से
میں راضی ہوں جو پھر تم چاہتی ہو
میں لٹ جاؤنگا پر اس سلسلے سے
ख़ुशी क्या चीज़ है और क्या सवेरा
भला क्या पूछना इक रतजगे से
خشی کیا چیز ہے اور کیا سویرا
بھلا کیا پوچھنا اک رتجگے سے
सुनो इक बात कहनी है ज़रूरी
न उलझा कर मुझ ऐसे मनचले से
سنو اک بات کہنی ہے ضروری
نہ اُلجھا کر مجھ ایسے منچلے سے
किसी भी मसअले पर चुप्पी उसकी
मुझे है मसअला इस मसअले से
کسی بھی مسئلے پر چپّی اسکی
مجھے ہے مسئلہ اس مسئلے سے
न मुम्किन सर जो करना हो तो कह दो
तुम अपने में निहाँ इक सिरफ़िरे से
نہ مُمکن سر جو کرنا ہو تو کہ دو
تم اپنے میں نہاں اک سرفرے سے
किसी से पूछ मत राज़-ए-तबाही
वो चाहे खुल के हो या वसवसे से
کسی سے پوچھ مت راز_تباہی
وہ چاہے کھل کے ہو یا وسوسے سے
मुहब्बत है तबाही या है तौफ़ीक़
'नज़र' मत पूछना इक दिलजले से
محبّت ہے تباہی یا ہے توفیق
نظر مت پوچھنا اک دلجکے سے
— नज़र نظر
मरहले - Stage
शिफ़ा - Cure
उल्फ़त - Love
सर - Accomplish
निहाँ - Hidden
वसवसे - Hesitation
तौफ़ीक़ - God's Grace
#एक_ख़याल
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