नहीं साहब ( ग़ज़ल )
तेज़ खंज़र है ख़त नहीं साहब
आप भी पर ग़लत नहीं साहब
تیز خنزر ہے خت نہیں صاحب
آپ بھی پر غلط نہیں صاحب
हमको लम्हा-ए-ज़ीस्त करने हैं कम
हमको सिगरट की लत नहीं साहब
ہمکو لمحہ_زیست کرنے ہیں کم
ہمکو سگرٹ کی لت نہیں صاحب
इक मुसलसल अज़ाब है हम तक
ज़ीस्त की अहमियत नहीं साहब
اِک مسلسل عذاب ہے ہم تک
زیست کی اہمیت نہیں صاحب
यादें बरसाएँ न अब हमारे घर
कोई दीवार-ओ-छत नहीं साहब
یادیں برسائیں ن اب ہمارے گھر
کوئی دیوار_و_چھت نہیں صاحب
बाँटने आये हैं हमारे ग़म आप
आपकी हैसियत नहीं साहब
بانٹنے آئے ہیں ہمارے غم آپ
آپکی حیثیت نہیں صاحب
कहता है दिल कि बे-वफ़ा हो जा
कहती है तरबियत , नहीं साहब
کہتا ہے دل ک بے وفا ہو جا
کہتی ہے تربیت ، نہیں صاحب
सुकूँ मिलता है नेकी करके हमें
आरज़ू-ए-सिफ़त नहीं साहब
سکوں ملتا ہے نیکی کرکے ہمیں
آرزو_سفر نہیں صاحب
कोई पूछे तो काश कह पाते
नहीं , कुछ ख़ैरियत नहीं साहब
کوئی پوچھے تو کاش کہ پاتے
نہیں ، کچھ خیریت نہیں صاحب
अपनी उजलत को हैं 'नज़र' मजबूर
कोई मसरूफ़ियत नहीं साहब
اپنی عجلت کو ہیں نظر مجبور
کوئی مصروفیت نہیں صاحب
— नज़र نظر
ज़ीस्त - Life
मुसलसल - Continuous
अज़ाब - Tormant,Pain
तरबियत - Education
सिफ़त - Praise
उजलत - Hurry
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