ज़िन्दगी

इतने बेसब्र तुम क्यूँ भला ,
ज़िन्दगी कुछ नया लिख रही ।

उससे मुझको न तोड़े कोई ,
वो मिरी शाख़ सी दिख रही ।

― नज़र


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