सियाही

दर्द के मौसम में हश्र-ए-दिल तो देख
फँस फँसा के चल रहीं थी धड़कनें भी

फिर तिरे पन्नों पे दिल घिसता रहा
और सियाही धड़कनों की चल पड़ी 

— नज़र



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