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दवा

दवा लेता हूँ मैं ख़ुश रहने को तेरा ग़म ख़ाक़ है मेरे आगे دوا لیتا ہوں میں خوش رہنے کو تیرا غم خاق ہے میرے آگے — नज़र نظر

रात

 फिर वही डर सताए जा रहा है फिर से इक रात काटनी है मुझे پھر وہی ڈر ستائے جا رہا ہے پھر سے اک رات کاٹنی ہے مجھے ― नज़र نظر

बे-वफ़ा ( ग़ज़ल )

इस क़दर इश्क़ का सिला देता  एक मुद्दत तलक नहीं सोता اس قدر عشق کا صلہ دیتا ایک مدّت تلک نہیں ستا फिर तेरा नाम जपता रहता मैं  नींद की गोलियाँ नहीं लेता پھر تیرا نام جپتا رہتا میں نیند کی گولیاں نہیں لیتا ज़िक्र महफ़िल में तेरी होती तब आज की तरह मैं नहीं रोता ذکر محفل میں تیری ہوتی تب آج کی طرح میں نہیں روتا तुझपे दीवान-ए-ख़ास लिखता मैं नाम तेरा यूँ ही नहीं खोता تُجھ پے دیوان_خاص لکھتا میں نام تیرا یوں ہی نہیں کھویا तुझको दिलवाता ओहदा-ए-हीर बीज नफ़रत के यूँ नहीं बोता تُجھکو دلواتا اوہدا_ہیر بیج نفرت کے یوں نہیں بوتا क़ज़ा होती मेरी तब इक पल जो  तू मेरी साँस में नहीं आता قضا ہوتی میری تب اک پل جو تو میری سانس میں نہیں آتا दर्द-ए-अफ़ज़ल भी हँस के सहता 'नज़र' तू अगर बे-वफ़ा नहीं होता درد_افضل بھی ہنس کے سہتا نظر تو اگر بے وفا نہیں ہوتا — नज़र نظر  दीवान - Collection of Ghazals क़ज़ा - Death अफ़ज़ल - Superior/Prime, सबसे उत्कृष्ट

रह-गुज़र

मसनद पे जो बैठें हैं उनसे कुछ नहीं उम्मीद अब ऐ रह-गुज़र तू ही सिमट के मुख़्तसर हो जा ज़रा مسند پے جو بیٹھیں ہیں انسے کچھ نہیں اُمّید اب اے رہگزر تو ہی سمٹ کے مختصر ہو جا ذرا — नज़र نظر मसनद - Seat of Honour मुख़्तसर - Concise रह-गुज़र - Pathway 

जाऊँ'गा

लाखों दिलों में घर बना के जाऊँ'गा बाद अपने मैं सबको रुला के जाऊँ'गा لاکھوں دلوں میں گھر بنا کے جاؤنگا بعد اپنے میں صبکو رُلا کے جاؤنگا — नज़र نظر

चश्म-ए-तर

अब इससे क्या बुरा होता तेरी सोहबत में जान-ए-जाँ मैं चश्म-ए-तर हूँ और मुझको तू देखे जा रही कब से اب اسے سے کیا برا ہوتا تیری سوحبت میں جانے جاں میں چشمے تر ہوں اور مجھکو تو دیکھے جا رہی کب سے — नज़र نظر सोहबत - Company , साथ चश्म-ए-तर - Eyes filled with Tears 

ख़ल्वत

ख़ल्वत की गोद में मुझे रोना है फूट के आज इस शब-ए-फ़िराक़ में ढाँढस मुझे न दो خلوت کی گود میں مجھے رونا ہے پھوٹ کے  آج اس شب ے فراق میں دھاندھس مجھے ن دو — नज़र نظر ख़ल्वत - Solitude , एकान्त शब-ए-फ़िराक़ - Night of Separation

सितम

सितम बरपा रही है ज़िन्दगी और मैं मेरे ऊपर न जाने कौन आएगा बचाने मुझको ऐसे में ستم برپا رہی ہے زندگی اور میں میرے اوپر ن جانے کون آئیگا بچانے مجھکو ایسے میں ― नज़र نذر

ग़म

मेरे ग़म जैसा किसी का ग़म नहीं ख़ैर छोड़ो कोई भी नइँ समझेगा میرے غم جیسا کسی کا غم نہیں خیر چھوڑو کوئ بھی نیں سمجھیگا ― नज़र نذر 

अँधेरा

बहोत से काम हैं उसको वो सब निपटा रही होगी मैं घर के कोने - कोने में अँधेरा ढूँढता हूँ बस بہت سے کام ہیں اسکو وہ سب نپٹا رہی ہوگی میں گھر کے کونے - کونے میں اندھیرا ڈھونڈھتا ہوں بس ― नज़र نذر 

हर्फ़

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तुम्हें कैसे  बताता  मैं  कि  मेरे  हर्फ़  थे  गीले जो तुमनें पूछा कल 'जाऊँ' तो मैंने 'हाँ' लिखा था वो تمہیں کیسے بتاتا میں ک میرے حرف تھے گیلے جو تمنیں پوچھا کل ' جون ' تو مہینے ' ہاں ' لکھا تھا وو — नज़र हर्फ़ - Word, letter

माँ ( ग़ज़ल )

ख़ुद में घुट के मर रहा हूँ देख ना माँ  टूट कर बिखड़ा पड़ा हूँ देख ना माँ  خد میں گھٹا کے مر رہا ہوں دیکھ نا ماں طور کر بکھڑا پڑا ہوں دیکھ نا ماں रोता हूँ फिर ख़ुद ही चुप हो जाता हूँ मैं कितना तन्हा हो गया हूँ देख ना माँ  روتا ہوں پھر خد ہی چپ ہو جاتا ہوں میں کتنا تنہا ہو گیا ہوں دیکھ نا ماں उल्टियाँ और नींद इक पल को नहीं है   काँपता सा मैं खड़ा हूँ देख ना माँ  الٹیاں اور نیند اک پل کو نہیں ہے کانپتا سا میں کھڑا ہوں دیکھ نا ماں हर तरफ़ से दर्दो-ग़म घेरे है मुझको  यादों में तेरी छिपा हूँ देख ना माँ ہر طرف سے درد و غم گھیرے ہے مجھکو یادوں میں تیری چھپا ہوں دیکھ نا ماں  मेरी सारी ख़्वाहिशें भी शल पड़ी हैं  ज़िन्दा हूँ या मर चुका हूँ देख ना माँ  میری ساری خاهشیں بھی شل پڑی ہیں زندہ ہوں یا مر چکا ہوں دیکھ نا ماں मौत से डरता था कितना याद है माँ  मौत को अब ढूँढ़ता हूँ देख ना माँ  موت سے ڈرتا تھا کتنا یاد ہے ماں موت کو اب ڈھونڈتا ہوں دیکھ نا ماں ― नज़र نظر शल - Insensitive

दर्द-ए-इश्क़ ( नज़्म )

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तुमको इक दिन ये मोहब्बत याद आएगी और फिर बातें मेरी तुमको रुलाएँगी नींद फिर रातों में तुमको भी न आएगी और मेरी चाहतें तुमको सताएँगी लाख आयेंगे मोहब्बत ले के तुम तक पर इश्क़ मेरे जैसा तुमसे कर न पायेंगे कुछ पलों को लब पे तेरे वो सजेंगे पर उम्र भर तेरे लबों पे रह न पायेंगे आज तुमको जो मोहब्बत दर्द लगती है कल तुम्हें अश्कों में वो शब भर हँसाएँँगी तुमको इक दिन ये मोहब्बत याद आएगी और फिर बातें मेरी तुमको रुलाएँगी झूठ के जज़्बात तुमको रास आयेंगे रात दिन तेरे लबों को वो हँसाएँँगे  कुछ पलों को तुम भी उनमें गुम हो जाओगी और फिर यूँ हीं मुझे तुम भूल जाओगी फिर किसी दिन सारे झूठे जज़्ब टूटेंगे  और मलाल ओ ग़म में तेरे अश्क छूटेंगे फिर तुम्हें उस रोज़ बस हम याद आयेंगे  तब तलक हम दूर पीछे छूट जायेंगे हर पहर हर पल फ़क़त तुम मुझको ढूँढोगी पर मोहब्बत लौट कर वापस न आएगी तुमपे लिक्खी फिर मेरी ग़ज़लें पढ़ोगी तुम फिर वो ही ग़ज़लें मेरी चाहत बताएँगी तुमको इक दिन ये मोहब्बत याद आएगी और फिर बातें मेरी तुमको रुलाएँगी छूट कर तुमसे मैं ख़ुद भ...

दिखता नहीं ( ग़ज़ल )

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या निहाँ हूँ या अयाँ दिखता नहीं ?  या फ़क़त ये राएगाँ दिखता नहीं ? یا نہاں ہوں يا عیاں دکھتا نہیں یا فقط یہ رایگاں دکھتا نہیں उसके भीतर जा बसा हूँ इस क़दर  दूसरा कोई जहाँ दिखता नहीं  اسکے بھیتر جا بسا ہوں اس قدر دوسرا کوئی جہاں دکھتا نہیں जलता रहता हूँ मैं ख़ुद की आग में  बस ज़माने को धुआँ दिखता नहीं  جلتا رہتا ہوں میں خد کی آگ میں بس زمانے کو دھواں دکھتا نہیں घुल गई हो तुम यूँ जिस्म-ओ-जान में  और कुछ भी जान-ए-जाँ दिखता नहीं  گھل گئی ہو تم یوں جسم_و_جان میں اور کچھ بھی جان_جاں دکھتا نہیں दिखता है सब कुछ ख़ुदाया बस तुझे  एक मेरा आस्ताँ दिखता नहीं  دکھتا ہے سب کچھ خدایا بس تجھے ایک میرا آستاں دکھتا نہیں इश्क़ की ईंटें हुआ करतीं थीं जो  वैसे ईंटों का मकाँ दिखता नहीं  عشق کی عینٹیں ہوا کرتیں تھیں جو ویسے عیٹوں کا مکاں دکھتا نہیں कह  दे ना  गर है कोई  मज़हब  तेरा   लड़ रहें  मज़हब  यहाँ  दिखता  नहीं ? کہ دے نا گر ہے کوئی مذہب تیرا لڑ رہیں مذہب یہاں دکھتا نہیں पाले हैं इतने मलाल-ओ-ग़म कि अब  आस...

बे-क़दर

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कब हुई तेरी क़दर जो आज होगी , इश्क़ तू तो बे-क़दर थी बे-क़दर है । ― नज़र

कूज़ा-गर

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कूज़ा-गर तुझसे फ़क़त इतनी शिकायत है मेरी बस मेरे  इस  मिट्टी के  दिल में  रेत  तूने  क्यूँ  मिला दी ― नज़र कूज़ा-गर ― Potter

हँसी

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ढूँढ़ने की सभी कोशिश यूँ ही ज़ाया हो गयी , जो हँसी थी  दरमियाँ में  वो कहीं पे खो गयी । ― नज़र मेरी सारी कोशिशें भी यूँ ही ज़ाया हो गयी , जो हँसी थी दरमियाँ में वो कहीं पे खो गयी । ― नज़र

में मेरे (ग़ज़ल)

जो   होती   नही  है  तू  बातों  में  मेरे ,  असल  में  तू  होती  है  साँसों  में  मेरे । तुम्हारी   कदर  हम   बताये   तो  कैसे , जो  रूठो  तो  आओ  न  रातों में  मेरे । मैं  फैला के  बाहें खड़ा था   खुशी  से , कि  दौड़ी  तुम  आओगी बाहों  में  मेरे । खड़ा   था  मैं   वैसे  ही  घंटों  वहाँ  पर , मगर  तुम  न  आयी  थी  राहों  में  मेरे । तेरी   राह    तकता   रहा   पागलों  सा , फ़क़त  तुम थी शामिल ख़यालों में मेरे । जब अगले सहर मैंने  खोली थी आँखें , कुछ अश्कें सजी थीं बस आँखों में मेरे । मैं बैठा हूँ शब भर  दिवारों से लग  कर , मैं  क्या क्या  बताऊँ  अशआरों में मेरे । मोहब्बत 'नज़र' क्या,है शक्ल ए ख़ुदाई , ख़ुदा  स...