जो होती नही है तू बातों में मेरे , असल में तू होती है साँसों में मेरे । तुम्हारी कदर हम बताये तो कैसे , जो रूठो तो आओ न रातों में मेरे । मैं फैला के बाहें खड़ा था खुशी से , कि दौड़ी तुम आओगी बाहों में मेरे । खड़ा था मैं वैसे ही घंटों वहाँ पर , मगर तुम न आयी थी राहों में मेरे । तेरी राह तकता रहा पागलों सा , फ़क़त तुम थी शामिल ख़यालों में मेरे । जब अगले सहर मैंने खोली थी आँखें , कुछ अश्कें सजी थीं बस आँखों में मेरे । मैं बैठा हूँ शब भर दिवारों से लग कर , मैं क्या क्या बताऊँ अशआरों में मेरे । मोहब्बत 'नज़र' क्या,है शक्ल ए ख़ुदाई , ख़ुदा स...